veeran ho gaya gaav ek bhoot ki kahani
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veeran ho gaya gaav ek bhoot ki kahani


भूत-भूत और भूत, सिर्फ भूत। जी हाँ, इस गाँव में हर व्यक्ति तब सिर्फ और सिर्फ भूत-प्रेत की ही बात करता था। आज भी यह गाँव भूत-प्रेत के छाए से उबर नहीं पाया है पर हाँ, आजकल भूत-प्रेत की चर्चा कम हो गई है या जानबूझकर इस गाँव-जवार के लोग भूत-प्रेतों की चर्चा करना नहीं चाहते। आखिर करें भी क्यों, ये लोग भूत-प्रेत की चर्चा? एक काला अध्याय जो बीत चुका है, उसके बारे में बात करना तो मूर्खता ही होगी और साथ ही डर, भय, आतंक की बात भला किसे अच्छी लगती है। बात करना तो दूर इस गाँव के कुछ बुजुर्ग लोगों के रोएँ खड़े हो जाते हैं केवल वह भूतही घटना याद करके।

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बात लगभग 40-50 साल पुरानी है। तब यह गाँव जवार-परगने के सबसे समृद्ध गाँवों में गिना जाता था। आखिर गिना भी क्यों न जाए, लगभग 30-40 घरों के इस इस गाँव में लगभग सभी घर-परिवार पूरी तरह से खानदानी समृद्ध थे और खेती-बारी भी बहुत ही अच्छी होती थी। इस गाँव में बीसों कुएँ, 10-12 तालाब हुआ करते थे। कोई भी ऐसा घर नहीं जिसके दरवाजे पर 2-4 लगहर चउआ (दूध देने वाले गाय, भैंस) न हों और साथ ही 2-4 जोड़ी अच्छे बैल। कहा जाता है कि उस समय इस गाँव के अधिकांश लोग विदेशों में नौकरी करते थे। इतना ही नहीं गन्ने की पैदावार के लिए यह गाँव अपने जवार का नामी गाँव था। जनवरी-फरवरी आदि के महीने में इस गाँव में कम से कम 7-8 कोल्हू प्रतिदिन चलते थे। कड़ाहों से उठती राब की मिठास पूरे वातावरण में फैल जाती थी। पूरा गाँव मीठा-मीठा हो जाता था। हर घर के सामने खोइया की टल्ली लग जाती थी। महीने-दो महीने इस गाँव के हर घर से कचरसी महक उठती रहती थी। हर घर में रसिआव आदि पकवान बनाए जाते थे, लाई-धोंधा बाँधा जाता था। यह वह समय था जब कुछ गाँवों में अच्छे-अच्छे लोगों को खाने को नहीं जुरता (मिलता) था। उस समय आस-पास के गाँव इस गाँव के कर्जदार हुआ करते थे।

इस गाँव के दक्खिनी छोर पर दूसरे गाँव से आकर एक धोबी परिवार बस गया था। गाँव भर के कपड़े आदि धोने से इस धोबी परिवार की अच्छी आमदनी हो जाती थी और किसी भी प्रकार से खाने-पीने की कोई कमी नहीं रहती थी। यह धोबी परिवार गाँव से सटे पूरब के ओर की कंकड़हिया गड़ही (तालाब) पर धोबी घाट बनाया था, जहाँ कपड़े पटककर धोने के लिए ठेहुनभर पानी में 2-3 लकड़ी के पाट (जिस पर पटक कर कपड़ा धोया जाता है) रखे गए थे। कपड़े धोने के बाद यह धोबी परिवार उन कपड़ों को वहीं गढ़ही किनारे पसारकर सूखा लेता था और फिर परिवार का कोई सदस्य गाँव में घूमकर जिसके कपड़े होते थे, उनके घर पर दे दिया करता था।

समय कब करवट बदल दे, खुशी कब मातम में बदल जाए, कहा नहीं जा सकता। समय का चक्र चलता रहता है, घुमता रहता है और अच्छे व बुरे दिनों का सूत्रपात करता रहता है। जी हाँ, पता नहीं कब इस गाँव की खुशियों को किसी की नजर लग गई? समृद्ध गाँव, हँसते-खेलते गाँव में एक दिन ऐसा आया कि सियारिन फेंकरने लगी। त्राहि माम्, त्राहि माम् मच गया। अधिकांश लोग अपने परिवार सहित गाँव छोड़कर दूसरे गाँवों में जाकर बसने लगे और एक भरा-पूरा गाँव उजाड़ हो गया। गाँव में गायों के रंभाने की, बछड़ों आदि के उझल-कूद करने की, किसानों को खेतों में जाने की, मजदूरों द्वारा सर पर बोझा लिए मस्त चाल से तो कुछ के दौड़ते हुए चलने की, चरवाहे की भैंस के पीठ पर बैठकर कोई पूरबिया तान छेड़ने की, घंसगर्रिन आदि के गुनगुनाने की, मक्के, गेहूँ आदि के खेत में गँवहारिनों द्वारा भथुआ आदि साग घोंटने की परंपरा समाप्त होती दिखी। बहुत सारे घरों में झींगुरों, चींटा-चींटियों, मकड़ी के जालों का साम्राज्य हो गया तो किसी के घर की धरन, घरन, छाजन आदि ने जमीन को चूम लिया।

हुआ यूँ कि धोबी परिवार की किसी रिस्तेदारी में एक ऐसी घटना घट गई की उस रिस्तेदार-परिवार के मात्र एक 14-15 वर्षीय रमेसर नामक किशोर को छोड़कर बाकी सभी महामारी के गाल में समा गए। विपत्ति के इस काल में धोबी परिवार उस असहाय किशोर का सहारा बनते हुए उसे अपने साथ अपने गाँव ले आया। दो-चार महीनों में वह किशोर अपनी विपत्तियों से उबरते हुए जीवन की नई राह पर चल पड़ा। अब वह उस धोबी परिवार के साथ ही रहकर कपड़े आदि धोने में उन सबकी मदद करने लगा। धीरे-धीरे वह किशोर गाँवभर का चहेता बन गया। वह गाँव के बड़-बुजुर्गों को नाना आदि तो युवा-अधबुड़ वर्ग को मामा आदि कहकर पुकारता था। अब तो इस गाँव से उसका अटूट संबंध बन गया था। लोगों के घर से कपड़े लेने और धोने के बाद पहुंचाने का काम अब अधिकतर वही करने लगा था। अचानक पता नहीं कब कपड़े लेने और देने के चक्कर में रमेसर के नैन उस गाँव की ललमुनिया से लड़ गए। ललमुनिया और रमेसर का प्यार इतना परवान चढ़ा कि उन लोगों ने एक-दूसरे के साथ जीने-मरने की कसम खा ली।

कहा जाता है कि इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपते। सत्य है यह कथन। ललमुनिया और रमेसर के प्यार की खबर गाँव वालों को लग गयी। एक दिन गाँव के कुछ दबंग लोग ललमुनिया के घर पहुँचे और ललमुनिया के परिवार वालों को यह बात बताई। ललमुनिया का परिवार भी गाँव का एक समृद्ध परिवार था अस्तु ललमुनिया की यह कारदस्तानी उन लोगों को बहुत ही नागवार गुजरी। ललमुनिया को समझाया गया पर वह झुकने को एकदम तैयार नहीं थी। अंत में उसे मारा-पीटा भी गया पर अब तो वह और निडर होकर सरेआम रमेसर के नाम की माला जपना शुरू कर दी थी। फिर क्या था, गाँव के लोग मिलकर उस धोबी परिवार के पास पहुँचे और रमेसर पर लगाम कसते हुए उसे उसके गाँव भेजने के लिए धोबी परिवार को बाध्य कर दिए। आखिर वह धोबी परिवार करता भी क्या, उसने पहले तो रमेसर को बहुत समझाया और बताया कि ये प्यार का खेल उसके साथ ही इस पूरे परिवार को ले डूबेगा, पर रमेसर मानने को तैयार नहीं हुआ। फिर क्या था, गाँव के डर से उस धोबी परिवार ने उस रमेसर को अपने घर से भगा दिया और कहा कि जहाँ तुम्हारी मर्जी हो चले जाओ और फिर कभी लौटकर इस गाँव में मुंह मत दिखाना।

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जी हाँ, रमेसर गाँव तो छोड़कर चला गया पर गाँव के बाहर नहर किनारे या किसी बाग-बगीचे या गन्ने आदि के खेत में उसका और ललमुनिया का छुप-छुप कर मिलना जारी रहा। अब यह बात उस गाँव से निकलकर आस-पास के अन्य गाँवों के लिए चर्चा का विषय बनती जा रही थी। फिर क्या था, इस गाँव के लोगों को यह बात बहुत ही नागवार गुजरी और इन लोगों ने आपस में तय किया कि अब पानी नाक से चढ़कर बह रहा है। कुछ तो करना होगा जिससे आस-पास के गाँवों में हमारी जगहँसाई न हो। प्लान के मुताबिक धोबी परिवार से कहा गया कि अब वह रमेसर को बुला ले। उसे माफ कर दिया गया है। अब हम गाँव वालों को उससे कोई शिकायत नहीं है। वह धोबी परिवार उस गाँव के लोगों की कुटिल, जालिम चाल को समझ नहीं सका। उस धोबी परिवार के सभी सदस्यों के चेहरे खुशी से गुलाबी हो गए। जी हाँ। अब रमेसर फिर से उस गाँव में आकर रहने लगा था। इस बार रमेसर का गाँव में आए अभी दूसरा दिन ही था। शाम का समय था और सूर्यदेव अस्तांचल में जाने के लिए बेचैन दिख रहे थे। उनका हल्का रक्तिम प्रकाश पेड़-पौधों की फुनगियों को रक्तरंजित करता पश्चिमी आकाश को गाढ़े खून रंग से रंग दिया था। पास के बगीचों में, पेड़-पौधों पर बैठे, इस डाल से दूसरी डाल पर फुदकते पक्षियों का कोलाहल कानों में मिश्री घोल रहा था। अचानक गाँव के 15-20 युवा, अधबुड़, बुजुर्ग गोल में उस धोबी परिवार के दरवाजे पर दस्तक दिए। उस समय रमेसर पास में ही झँटिकट्टे में झाँटी काटने में मगशूल था। अचानक बातों-बातों में ही उस धोबी परिवार के सवांग कुछ समझें उससे पहले ही गाँव के कुछ युवा उस झँटिकट्टे में पहुँच कर रमेसर को दबोच लिए। कोई कुछ कहे, धोबी परिवार रोए-गिड़गिड़ाए इससे पहले ही वहाँ जमा भीड़ ने फरसे, भाले आदि से रमेसर पर हमला कर दी। भद्दी गालियाँ देती हुई, महाराक्षस बनी वह भीड़ रमेसर पर टूट पड़ी थी। धोबी परिवार का गिड़गिड़ाना, हाथ-पैर जोड़ना, रोना-चिल्लाना सब व्यर्थ था। देखते ही देखते पागल, राक्षसी भीड़ ने उस किशोर रमेसर को मौत के घाट उतार दिया तथा साथ ही उस धोबी परिवार को मुँह खोलने पर बहुत ही बुरा अंजाम की धमकी देते हुए पास के ही उस कंकड़हिया गड़ही के किनारे रमेसर की खून से लथपथ लाश को जलाकर दफना दिए। समय धीरे-धीरे उस गाँव को बरबादी की ओर अग्रसर करने में जुट गया। अभी रमेसर वाले कांड को हुए 5 दिन भी नहीं बीते थे कि एक दिन सुनने में आया की ललमुनिया ने भी उसी गड़ही के किनारे बाँस की कुछ कोठियों के बीच साड़ी से अपने गले को ऐंठकर अपने जीभ को सदा-सदा के लिए पूरा बाहर कर दिया। इस घटना के बाद गाँव में पूरी तरह से मातम छा गया था।

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इस घटना को बीते अभी 2-3 माह भी नहीं हुए थे कि एक दिन सुबह-सुबह झाड़ा फिरने के बाद उस कंकड़हिया गड़ही में मल धोने गए दो 10-12 साल के बच्चों की लाश उस गड़ही के किनारे पाई गई। ऐसा लगता था कि किसी ने बेरहमी से उन दोनों अबोध बालकों को गला दबाकर मार दिया हो। अब तो आए दिन कोई न कोई भयावह घटना घटने लगी। ऐसी डरावनी घटनाएँ, हृदयविदारक घटनाएँ कि गाँव वालों का जीवन नर्क बन गया। जी हाँ, अब तो गाँववालों को गाँव के आस-पास अजीब-सी आवाजें सुनाई देती थीं और कभी-कभी बँसवाड़ी या बगीचे आदि में, सुनसान में, बहुत ही सुबह या रात आदि को रमेसर और ललमुनिया को एक साथ घूमते हुए, प्यार के गीत गुनगुनाते हुए तो कभी-कभी भयानक, डरावने रूप में देखा जाने लगा। गाँव में ऐसा लगता था कि विपत्तियों, भयानक घटनाओं का पहाड़ सा टूट पड़ा है। कभी बिना आग के ही किसी के घर में आग लग जाती तो कभी कुछ लोगों के घरों में बक्से में रखे कपड़े आदि बाक्स बंद होने के बाद भी जले हुए पाए जाते। कुछ लोगों के घरों में थाली में परोसे हुए भोजन में अपने आप किसी जानवर का कच्चा मांस आदि आ जाता तो किसी की गाय या भैंस के दूध का रंग लाल हो जाता। गाँव वाले पूरी तरह से परेशान हो गए थे। उनका जीवन दुर्भर हो गया था। इतना ही नहीं उस रमेसर को मारने में साथ देने वाले हर व्यक्ति का अंजाम बहुत ही बुरा हुआ। सबको अकाल मृत्यु हुई। कोई पानी में डूबकर तो कोई बिना आँधी के ही किसी बगीचे में डालियों से दबा मृत पाया गया। कोई बिना बीमारी के खून धकचकर मर गया तो किसी ने पता नहीं क्यों खुद ही फँसरी लगा ली। बहुत ही भयावह, दर्दनाक स्थिति बन गई थी उस गाँव की।

ऐसी भयावह परिस्थिति के बाद एक-एक करके उस गाँव के लोग गाँव छोड़कर किसी और गाँव में जाने लगे पर भूत-प्रेत बने उस रमेसर और ललमुनिया के आतंक में कोई कमी नहीं आई। अंत में गाँव में बचे कुछ अच्छे लोग जिन्होंने मन ही मन रमेसर की मृत्यु पर अफसोस जाहिर किया था, एक बड़े पंडितजी को गाँव में बुला लाए। पंडितजी के बहुत ही पूजा-पाठ करने के बाद, मासिक यज्ञ-हवन करने के बाद भूत-प्रेत का आतंक थोड़ा कम हुआ। अंत में उस पंडीजी ने गाँववालों से रमेसर और ललमुनिया की आत्मा की शांति के लिए अनुष्ठान करवाए। आज वह गाँव विरान है, उजड़ा हुआ है, मात्र एक्के-दुक्के घर सही-सलामत दिखते हैं पर उनके भी दरवाजे पर ताले लटक रहे हैं। आज भी उस गाँव से जाते किसी पथिक, राही आदि को और साथ ही आस-पास के गाँव वालों को दोपहर के समय या रात को उस कंकड़हिया गड़ही पर किसी द्वारा कपड़े धोने, पटकने की आवाज आती रहती है तथा साथ ही यह भी सुनाई देता है कि मामा आवS, कपड़ा सुखावS…….. तथा इसके बाद कभी-कभी भयानक रोने की तो कभी भयानक अट्टहास से पूरी गढ़ही सहम-सी जाती है। दोस्तों किसी का बुरा न करें। अगर किसी ने कोई गलती की हो तो उसे समझाने का प्रयत्न करें, कुछ भी ऐसा न करें कि उसके साथ ही आपका भविष्य भी अंधकारमय हो जाए। कानून का सम्मान करें। जय-जय।


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