Sacchi Ghatna Bhagwan khud aye darshan dene
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मैं बार-बार एक ही बात दुहराता रहता हूँ कि अगर भगवान का अस्तित्व है, ईश्वर का अस्तित्व है तो भूत-प्रेतों का क्यों नहीं? आत्माओं का क्यों नहीं? समय-समय पर आत्माओं के कुछ पुख्ता सबूत भी मिल जाते हैं। भारत ही नहीं विदेशों में भी आत्माएँ अपने होने का भान कराती रहती हैं। खैरठीक है, चलिए विज्ञान की ही शरण में चलते हैं पर तब तक तो हम इन बातों को नकार नहीं सकते, जबतक विज्ञान पूरी तरह से, बातों में घुमाकर, उलझाकर नहीं अपितु यह दिखा न दे, पूरी तरह सिद्ध न कर दे कि आत्माओं का अस्तित्व नहीं होता।

Sacchi Ghatna Bhagwan khud aye darshan dene

Sacchi Ghatna Bhagwan khud aye darshan dene

आत्मा नाम की कोई चीज नहीं होती। यह ब्रह्मांड अनेकानेक प्राणियों, रहस्यों आदि से भरा पड़ा है। बहुत सारी ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं, जिन्हें विज्ञान की शरण में भी जाकर नकारना संभव नहीं होता। खैर, ये विवाद का या कह लें विचार का अभी विषय नहीं है और ना ही मैं यह सिद्ध करना चाहता हूँ कि आत्माएँ होती ही हैं पर विज्ञान की इस बात से भी सहमत नहीं हूँ कि आत्माएँ (भूत-प्रेत आदि) नहीं होतीं।
आज मैं आप लोगों को जो कहानी सुनाने जा रहा हूँ वह पूरी तरह से अलौकिक, रहस्यमयी है। यह कहानी आत्मा और परमात्मा से ही जुड़ी हुई है पर परमात्मा के अस्तित्व को साकार करती है। यह कहानी मैंने अपने गाँव में ही सुन रखी है और जिन महानुभाव से सुनी है, उनका कहना था कि यह बनावटी, काल्पनिक कहानी नहीं अपितु पूरी तरह से सत्य है, सच्ची घटना पर आधारित है। ऐसी कहानियाँ, घटनाएँ आदि प्रायः सुनी जाती रही हैं या कह लें कि पत्रिकाओं आदि के माध्यम से पढ़ने को मिलती रही हैं। इस घटना का जो कलेवर है, इस घटना में घटिट जो घटनाएँ हैं वे इसकी सत्यता को सिद्ध ही करती हैं और ये बनावट, काल्पनिकता से कोसों दूर लगती हैं। भूमिका को बढ़ा न करते हुए मैं सीधे इस अलौकिक कहानी पर आ जाता हूँ पर कहानी को कहानी का रूप देने के लिए कल्पित व्यक्तिनाम, स्थान नाम का सहारा लेना उचित है।
घटना बहुत पुरानी नहीं है पर 18-20 वर्ष पहले की तो है ही। नगेसर सिंह जी उस समय एक चीनी मिल में वाचमैन के रूप में कार्यरत थे। बड़ी-बड़ी मूँछोंवाले नगेसर सिंह जी की उम्र कोई 28-30 की होगी। लंबा, गोरा शरीर के धनी नगेसर जी के चेहरे पर सदा एक सौम्यता तैरती रहती थी। नगेसर जी पूरी तरह से शाकाहारी थे और पूजा-पाठ में विशेष रुचि रखते हुए अपने वाचमैनी के काम को भी भगवान का प्रसाद मानकर पूरी तन्मयता से करते थे। सभी बड़े अधिकारियों के साथ ही उस चीनी मिल का हर वर्कर नगेसरजी की प्रशंसा में नतमस्तक ही रहता था। यहाँ तक कि मिल के आस-पास के लोग भी नगेसरजी का बहुत सम्मान करते थे और अपने वहाँ होने वाले यज्ञ-प्रयोजन में, पूजा-पाठ में उन्हें आमंत्रित करना नहीं भूलते थे। दरअसल नगेसर जी की आवाज बहुत ही मधुर थी और वे किर्तन-भजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। उनकी आवाज का जादू श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता था और लोग प्रसन्नमन से झूमे बिना नहीं रह पाते थे। नगेसरजी खाली समय में बहुत सारे सुन्दर-सुन्दर, कर्णप्रिय भजनों की रचना भी करते रहते थे। उनकी भक्तिमय रचनाओं से 3-4 रजिस्टरों जैसी पुस्तिकाएँ भर गई थीं। जैसा कि मिलों, कारखानों आदि में कर्मचारियों को शिफ्ट में काम करना पड़ता है, उन्हें पाली में काम करना पड़ता है, वैसे ही नगेसर जी की भी ड्यूटी बदलती रहती थी। कभी दिन पाली तो कभी रात पाली। इतना ही नहीं कभी किसी वाचमैन की अनुपस्थिति में भी नगेसरजी कांटिन्यू ड्यूटी करने में संकोच नहीं करते थे। जी हाँ, पर नगेसर जी की एक बहुत बड़ी कमजोरी थी। अगर कहीं भजन-किर्तन होने की बात वे जान जाते तो बिना बुलाए भी पहुँच जाते। इतना ही नहीं अगर कहीं आस-पास के गाँव में रात-बिरात भी हो रहे किर्तन आदि की आवाज इनके कान में पहुँच जाती तो ये निकल पड़ते।
एक बार की बात है। अंतिम पेराई के बाद चीनी-मिल बंद हो गया था। बहुत सारे सिजनल कर्मचारी अपने गाँव-शहरों की ओर लौट गए थे पर वाचमैन होने के नाते नगेसरजी को मिल के गेट पर पहरा देने के लिए ड्यूटी तो देना ही था। उस समय के कर्मचारी-अधिकारी अपने काम को ईमानदारी से अपना उत्तरदायित्व समझते हुए करते थे। और ‘कर्म ही पूजा है’ में तो नगेसरजी पूरा विश्वास रखते थे। जी हाँ, उस समय उस मिल में एक नया मैनेजर आया था और वह बहुत ही सख्त था। उसे किसी भी प्रकार से अपने काम में हिला-हवाली करने वाले लोग पसंद नहीं थे। वह अपना काम भी पूरी तन्मयता से करता था और रात-बिरात अपने बंगले रूपी क्वार्टर से निकलकर मिल आदि में घूमा भी करता था। इसी बहाने वह उस पाली में काम करने वाले लोगों पर ध्यान भी रखता था। उस समय रात पाली में नगेसरजी पूरी मुस्तैदी के साथ मिल के गेट पर खड़े या सावधानीपूर्वक टहलते हुए नजर आते थे। नगेसरजी की ईमानदारी, उनकी कर्तव्यनिष्ठा की बात इस मैनेजर ने भी सुन रखी थी। इतना ही नहीं, वह मैनेजर आधी रात के बाद लगभग 2-3 बजे औचक निरीक्षण भी करता था पर जब-जब वह मिल के गेट पर पहुँचा, नगेसर जी को पूरी मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी करते पाया।
उस रात नगेसरजी अपने क्वार्टर से निकलकर ज्योंही मिल के गेट पर आए तभी उनका एक सहकर्मी बोला कि पास के गाँव में किर्तन का आयोजन है। दूर-दूर से बड़े-बड़े किर्तिनियाँ भी आ रहे हैं। पूरी तरह भक्तिमय माहौल बनने वाला है। वैसे भी आज तो मिल पूरी तरह बंद है। दरवाजे पर बड़ा ताला लटका है। साहब (मैनेजर) भी कहीं बाहर गया है। समय देखकर आप भी साइकिल उठाना और आ जाना। एक-आध घंटे किर्तन का आनंद लेने के बाद फिर अपनी ड्यूटी पर आ जाना। वैसै भी आपको कौन पूछने वाला है। सब लोग आपका बहुत सम्मान करते हैं, चाहें मैनेजर ही क्यों न हो। और इतना ही नहीं, रमेसर काका तो हैं ही, वे संभाल लेंगे। (दरअसल गेट पर दो वाचमैंनों की ड्यूटी लगती थी, उस रात नगेसरजी के साथ एक थोड़े बुजुर्ग रमेसर काका की ड्यूटी लगी हुई थी।) उस सहकर्मी की बात सुनकर नगेसरजी कुछ न बोले, सिर्फ मुस्कुराकर रह गए।
आधी रात का समय। पूरी तरह से सन्नाटा पसरा था। इस सन्नाटे को चिरते हुए पास के गाँव में हो रहे किर्तन की आवाज कानों में रस घोल रही थी। नगेसरजी मुस्तैदी से गेट पर खड़े होकर सुरीली आवाज में हो रहे किर्तन को गुन-गुना रहे थे। अभी 1 भी नहीं बजे होंगे तभी रमेसर काका का लड़का दौड़ते हुए आया और बोला कि माँ को बिच्छू ने काट लिया है। वह बहुत छटपटा रही है। फिर क्या था, नगेसरजी ने रमेसर काका से कहा कि आप जाइए, मैं संभाल लूँगा। ठीक है, 1-2 घंटे में आता हूँ ऐसा कहकर रमेसर काका अपने लड़के के साथ अपने क्वार्टर की ओर चल दिए। इधर कीर्तन की मधुमय, भक्तिमय, संगीतमय आवाज नगेसरजी को अपने बस में किए जा रही थी, वे मदमस्त हुए जा रहे थे और किर्तन में खोए जा रहे थे। अचानक उनके मन ने कहा कि क्यों ने चलकर एक-आधे घंटे किर्तन का आनंद लिया जाए। पर फिर सोचे कि ड्यूटी छोड़कर जाना कत्तई ठीक नहीं। उनके मन में उथल-पुथल मची हुई थी। फिर उन्होंने सोचा कि ऐसी ड्यूटी से क्या फायदा कि मैं अपने ईष्टदेव की वंदना भी नहीं कर सकता। उनके भजन कीर्तन में भाग भी नहीं ले सकता। अचानक उन्होंने फैसला लिया कि कल मैं मैनेजर साहब से सारी बात बताकर नौकरी छोड़ दूँगा पर अब तो मैं उस स्थल पर जरूर जाऊँगा जहाँ से ये सुमधुर भक्तिमय आवाज आ रही है। इसके बाद उन्होंने भगवान राम को याद करते हुए मन ही मन कहा कि प्रभु, अब मुझसे इस संसार की नौकरी नहीं होगी, अब तो मैं सिर्फ और सिर्फ आपकी नौकरी ही करूँगा। बस।
इसके बाद निश्चिंत मन से नगेसरजी कीर्तन की जगह पर पहुँचे। कीर्तन का आनंद लेने के साथ ही अपने मधुमयी आवाज में कीर्तन गाए भी। दरअसल जब नगेसर जी कीर्तन गाते थे तो पूरे मन से और उसी में रच-बस जाते थे। कीर्तन गाते समय उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने ईष्टदेव याद रहते थे। कीर्तन समाप्ति के बाद लगभग सुबह 4 बजे नगेसर जी मिल के गेट पर पहुँचे। रमेसर काका मिल के गेट पर ही एक टूटी काठकुर्सी पर बैठे-बैठे ऊंघ रहे थे। नगेसर जी ने रमेसर काका को उठाना सही नहीं समझा और फिर से मुस्तैदी के साथ वाचमैनी करने लगे तथा साथ ही नई पाली के वाचमैनों के आने का इंतजार भी। क्योंकि उन्होंने मन बना लिया था कि ड्यूटी से छूटते ही वे सीधे मैनेजर साहब के बंगले पर जाएंगे और रात की बात का जिक्र करते हुए, नौकरी से त्यागपत्र दे देंगे।
सुबह 8-9 बजे के करीब नए वाचमैनों के आते ही नगेसर जी कुछ बोलें, उससे पहले ही रमेसर काका बोल पड़े, “नगेसरजी, रूकिए, मैं भी आपके साथ चलता हूँ।” रमेसर काका की यह बात सुनकर नगेसरजी बोले, “पर काका, मैं अपने क्वार्टर की ओर न जाकर, मैनेजर साहब के क्वार्टर पर जा रहा हूँ।” नगेसर जी के इतना कहते ही रमेसर काका हँस पड़े और हँसते हुए बोले, “हाँ बाबा! मालूम है। रात को करीब 3 बजे साहब तो आए ही थे न। वे ही आपको बोले कि नगेसरजी थोड़ा सुबह-सुबह ड्यूटी से छूटते समय मुझसे मिलते जाना और साथ ही रमेसर काका आप भी।” रमसर काका की यह बात नगेसरजी को बड़ी अटपटी लगी। अरे, 3 बजे तो मैं कीर्तन गा रहा था। यहाँ था ही नहीं फिर मैनेजर साहब आए भी पर मैं नहीं था तो वे किससे बोलकर गए। कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे एवज में भगवान, मेरे ईष्टदेव को खुद आकर नौकरी बजानी पड़ी। नगेसरजी पूरी तरह से भौचक्के। कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था और ना ही वे अब रमेसर काका से कुछ और जानना चाहते थे। वे चुपचाप रमेसर काका के साथ मैनेजर साहब के क्वार्टर की ओर चल दिए।
मैनेजर साहब अपने क्वार्टर में अंदर लगे पौधों को पानी दे रहे थे। नगेसरजी और रमेसर काका को देखते ही वे बड़े अदब के साथ इन दोनों को लेकर अंदर गए। इतना ही नहीं, वे बड़े प्रेम से इन दोनों को कुर्सी पर बिठाए तथा साथ ही अपनी पत्नी से चाय लाने के लिए कहे। नगेसरजी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। खैर, मैनेजर साहब ने ही बात शुरू की। मैनेजर साहब ने कहा कि नगेसरजी आपकी कर्तव्यनिष्ठा का मैं कायल हो गया हूँ। हर व्यक्ति आपकी तारीफें करता है। कल रात भी जब मैं 3 बजे के लगभग मिल के गेट पर पहुँचा तो क्या देखता हूँ कि रमेसर काका तो कुर्सी पर बैठे हुए हैं पर आप खड़े होकर मुस्तैदी के साथ अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं। मैं आपसे अति प्रसन्न हूँ और आज से आप को वाचमैनों का हेड नियुक्त करता हूँ। आज से आपको ड्यूटी पर जाने की जरूरत नहीं, आप कार्यालय में बैठकर भी सारे वाचमैनों की ड्यूटी लगाएंगे और अपने हिसाब से काम करेंगे। आज से आपके किसी भी काम में कोई रोक-टोक नहीं होगी। यह आज तक आपके द्वारा इस मिल के लिए किए गए कर्तव्य निर्वहन का पुरस्कार है, आपकी कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी का पुरस्कार है। इतना सुनते ही नगेसरजी का गला रूंध आया, वे कुछ कहना चाहते थे पर रुँधे कंठ से कोई आवाज बाहर न आई, बस, आँखों से आसूँ बह निकले और मन ने मन में कहा, हे प्रभु, तूँ अपने भक्त का कितना ख्याल रखता है। मैं तेरी सेवा में गया तो तूँ मेरी सेवा में आ गया। खैर इसके बाद मैनेजर साहब ने रमेसर काका की ओर देखते हुए कहे कि आज से रमेसर काका की ड्यूटी भी रात को नहीं लगेगी। इन्हें केवल दिन में ड्यूटी करना होगा। क्योंकि इन्होंने भी इस मिल की बहुत सेवा की है। अब उम्र भी हो गई है तो इसके चलते इन्हें केवल दिन में ड्यूटी लगाई जाएगी और साथ ही इनके बड़े लड़के को भी मिल में काम दिया जाएगा। अब इससे बड़ा चमत्कार क्या होगा? मात्र नगेसरजी के साथ रहने से रमेसर काका का भी कल्याण हो गया। धन्य हैतूँ प्रभु।
इस घटना के काफी समय बाद तक नगेसरजी किसी को कुछ नहीं बताए पर जब उस मैनेजर का तबादला हो गया और वह जाने लगा तो नगेसरजी अपने आप को रोक नहीं पाए और रोते हुए उस रात की घटना बता दिए। इस घटना को सुनते ही मैनेजर भी रो पड़ा और भावुक होकर नगेसर जी के चरणों में गिर गया। मैनेजर रो पड़ा, धन्य हैं आप नगेसरजी, आपके चलते ही उस रात मुझे ईश्वर के दर्शन हो गए। अब मुझे इस जीवन में कुछ नहीं चाहिए और भगवान की सेवा में, आप जैसे लोगों की सेवा में मैंअपना बचा जीवन अर्पित कर रहा हूँ। जी हाँ, उसके बाद वह मैनेजर नई नौकरी ज्वाइननहीं किया और नगेसरजी के शिष्य के रूप में अपना जीवन सरल, भक्तिमय तरीके से बिताने लगा।
यह कहानी आत्मा यानी भूत-प्रेस से अलग हटकर है पर ईश्वर के अस्तित्व को रूप प्रदान करती है। उसकी गौरवमयी गाथा गाती है, अपने भक्तों पर किए गए उसके उपकार की कहानी कहती है। सच ही कहा गया है कि भगवान अपने भक्तों के बस में होते हैं। उन्हें उनके भक्त अति प्रिय हैं।

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