(100+) Mirza Ghalib Best shayari collection on Cbrmix.com

Mirza Ghalib

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(100+) Mirza Ghalib Best shayari collection


उस लब से मिल ही जाएगा बोसा कभी तो हाँ


उस लब से मिल ही जाएगा बोसा कभी तो हाँ
शौक़-ए-फ़ुज़ूल ओ जुरअत-ए-रिंदाना चाहिए

काव काव-ए-सख़्त-जानी हाए-तन्हाई न पूछ
सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का

कभी नेकी भी उस के जी में गर आ जाए है मुझ से
जफ़ाएँ कर के अपनी याद शरमा जाए है मुझ से

काँटों की ज़बाँ सूख गई प्यास से या रब
इक आबला-पा वादी-ए-पुर-ख़ार में आवे

(100+) Mirza Ghalib Best shayari collection

 

Aata hai daagh-e-hasrat-e-dil ka shumaar yaad


Aata hai daagh-e-hasrat-e-dil ka shumaar yaad
mujh se mire gunah ka hisaab ai khuda na maang

 

तेरे हुस्न को परदे की ज़रुरत नहीं है ग़ालिब


तेरे हुस्न को परदे की ज़रुरत नहीं है ग़ालिब
कौन होश में रहता है तुझे देखने के बाद

 

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’


इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने

इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया

आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीं ख़याल में
‘ग़ालिब’ सरीर-ए-ख़ामा नवा-ए-सरोश है

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

 

Aage aati thi haal-e-dil pe hansi


Aage aati thi haal-e-dil pe hansi
ab kisi baat par nahi aati

 

हो लिए क्यों नामाबर के साथ -साथ


हो लिए क्यों नामाबर के साथ -साथ
या रब ! अपने खत को हम पहुँचायें क्या

 

Ishq Se Tabiyat Ne Zeest Ka Mazaa Paya


Ishq Se Tabiyat Ne Zeest Ka Mazaa Paya,
Dard Ki Dawa Payi Dard Be Dawa Paya.
इश्क से तबियत ने जीस्त का मजा पाया,
दर्द की दवा पाई दर्द बे-दवा पाया।

 

उग रहा है दर-ओ -दीवार पे सब्ज़ा “ग़ालिब “


उग रहा है दर-ओ -दीवार पे सब्ज़ा “ग़ालिब “
हम बयाबान में हैं और घर में बहार आई है ..

 

क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं


क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ

अगले वक़्तों के हैं ये लोग इन्हें कुछ न कहो
जो मय ओ नग़्मा को अंदोह-रुबा कहते हैं

अपना नहीं ये शेवा कि आराम से बैठें
उस दर पे नहीं बार तो का’बे ही को हो आए

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

 

Tum Na Aaoge Toh Marne Ki Hai Sau Tadbeerein


Tum Na Aaoge Toh Marne Ki Hai Sau Tadbeerein,
Maut Kuchh Tum Toh Nahi Hai Ki Bula Bhi Na Saku.
तुम न आओगे तो मरने कि है सौ ताबीरें,
मौत कुछ तुम तो नहीं है कि बुला भी न सकूं।

Mirza Ghalib

Hain Aur Bhi Duniya Mein Sukhan-War Bahot Achhe


Hain Aur Bhi Duniya Mein Sukhan-War Bahot Achhe,
Kehte Hain Ki Ghalib Ka Hai Andaaz-e-Bayan Aur.
हैं और भी दुनिया में सुखन-वर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और।

 

Apni gali men mujhko na kar dafn baad-e-qatl


Apni gali men mujhko na kar dafn baad-e-qatl
mere pate se khalq ko kyuun tera ghar mile

 

नुक्ता चीन है , गम -ऐ -दिल उस को सुनाये न बने


नुक्ता चीन है , गम -ऐ -दिल उस को सुनाये न बने
क्या बने बात , जहाँ बात बनाये न बने

मैं बुलाता तो हूँ उस को , मगर ऐ जज़्बा -ऐ -दिल
उस पे बन जाये कुछ ऐसी , के बिन आये न बने

खेल समझा है , कहीं छोड़ न दे , भूल न जाये
काश ! यूँ भी हो के बिन मेरे सताए न बने

खेल समझा है , कहीं छोड़ न दे , भूल न जाये
काश ! यूँ भी हो के बिन मेरे सताए न बने

ग़ैर फिरता है लिए यूँ तेरे खत को कह अगर
कोई पूछे के ये क्या है , तो छुपाये न बने

इस नज़ाकत का बुरा हो , वो भले हैं , तो किया
हाथ आएं , तो उन्हें हाथ लगाये न बने

कह सकेगा कौन , ये जलवा गारी किस की है
पर्दा छोड़ा है वो उस ने के उठाये न बने

मौत की रह न देखूं ? के बिन आये न रहे
तुम को चाहूँ ? के न आओ , तो बुलाये न बने

इश्क़ पर ज़ोर नहीं , है ये वो आतिश ग़ालिब
के लगाये न लगे , और बुझाए न बने

 

नुक्ता चीन है , गम -ऐ -दिल उस को सुनाये न बने


मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें
चल निकलते जो में पिए होते
क़हर हो या भला हो , जो कुछ हो
काश के तुम मेरे लिए होते
मेरी किस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी या रब कई दिए होते
आ ही जाता वो राह पर ‘ग़ालिब ’
कोई दिन और भी जिए होते

 

लफ़्ज़ों की तरतीब मुझे बांधनी नहीं आती “ग़ालिब”


लफ़्ज़ों की तरतीब मुझे बांधनी नहीं आती “ग़ालिब”
हम तुम को याद करते हैं सीधी सी बात है

 

Itne Kahan Mashroof Ho Gaye Ho Tum


Itne Kahan Mashroof Ho Gaye Ho Tum,
AajKal Dil Dukhane Bhi Nahi Aate.
इतने कहाँ मशरूफ हो गए हो तुम,
आजकल दिल दुखाने भी नहीं आते।

Jee dhoondhta hai fir vahi fursat ke raat din


Jee dhoondhta hai fir vahi fursat ke raat din
baithe rahen tasavvur-e-jaanaan kiye huye

 

दिल दिया जान के क्यों उसको वफादार


दिल दिया जान के क्यों उसको वफादार , असद
ग़लती की के जो काफिर को मुस्लमान समझा

 

सादगी पर उस के मर जाने की हसरत दिल में है


सादगी पर उस के मर जाने की हसरत दिल में है
बस नहीं चलता की फिर खंजर काफ-ऐ-क़ातिल में है
देखना तक़रीर के लज़्ज़त की जो उसने कहा
मैंने यह जाना की गोया यह भी मेरे दिल में है

 

तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिला के दिखा


तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिला के दिखा
नहीं तो दो घूँट पी और मस्जिद को हिलता देख

 

Koi ummeed bar nahi aati


Koi ummeed bar nahi aati
koi soorat nazar nahi aati

 

ख्वाहिशों का काफिला भी अजीब ही है ग़ालिब


ख्वाहिशों का काफिला भी अजीब ही है ग़ालिब
अक्सर वहीँ से गुज़रता है जहाँ रास्ता नहीं होता

 

गैर ले महफ़िल में बोसे जाम के


गैर ले महफ़िल में बोसे जाम के
हम रहें यूँ तश्ना-ऐ-लब पैगाम के
खत लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के
इश्क़ ने “ग़ालिब” निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के

 

आया है मुझे बेकशी इश्क़ पे रोना ग़ालिब


आया है मुझे बेकशी इश्क़ पे रोना ग़ालिब
किस का घर जलाएगा सैलाब भला मेरे बाद

 

Aaina dekh apna sa munh le ke rah gaye


Aaina dekh apna sa munh le ke rah gaye
saahab ko dil na dene pe kitna guruur tha

 

Aaye hai be-kasi-e-ishq pe rona ‘Ghalib’


Aaye hai be-kasi-e-ishq pe rona ‘Ghalib’
kis ke ghar jaayega sailaab-e-balaa mere baad

 

बाजीचा-ऐ-अतफाल है दुनिया मेरे आगे


बाजीचा-ऐ-अतफाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

 

मोहब्बत मैं नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का


मोहब्बत मैं नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते है जिस काफिर पे दम निकले

 

Teri Yaadon Ke Har Taraf Hujoom


Teri Yaadon Ke Har Taraf Hujoom,
Kitni Roshan Hai Meri Tanhayi.
तेरी यादों के है हर तरफ़ हुजूम,
कितनी रोशन है मेरी तन्हाई।

 

Jaan tum par nisaar karta hun


Jaan tum par nisaar karta hun
mai nahi jaanta dua kya hai

 

Is nazaaqat ka bura ho vo bhale hain to kya


Is nazaaqat ka bura ho vo bhale hain to kya
haath aave to unhe haath lagaaye na bane

 

इस दिल को किसी की आहट की आस रहती


इस दिल को किसी की आहट की आस रहती
है, निगाह को किसी सूरत की प्यास रहती है,
तेरे बिना जिन्दगी में कोई कमी तो नही, फिर
भी तेरे बिना जिन्दगी उदास रहती है॥

 

रही न ताक़त -ऐ -गुफ्तार और अगर हो भी


रही न ताक़त -ऐ -गुफ्तार और अगर हो भी ,
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है

 

Aashiq hoon pe maashooq-farebi hai mira kaam


Aashiq hoon pe maashooq-farebi hai mira kaam
majnuun ko bura kahti hai laila mere aage

 

सबने पहना था बड़े शौक से कागज़ का लिबास


सबने पहना था बड़े शौक से कागज़ का लिबास
जिस कदर लोग थे बारिश में नहाने वाले
अदल के तुम न हमे आस दिलाओ
क़त्ल हो जाते हैं , ज़ंज़ीर हिलाने वाले

 

दर्द हो दिल में तो दबा कीजिये


दर्द हो दिल में तो दबा कीजिये
दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजिये

 

Aaye hai be-kasi-e-ishq pe rona


Aaye hai be-kasi-e-ishq pe rona ‘Ghalib’
kis ke ghar jaayega sailaab-e-balaa mere baad

 

उस अंजुमन-ए-नाज़ की क्या बात है


उस अंजुमन-ए-नाज़ की क्या बात है ‘ग़ालिब’
हम भी गए वाँ और तिरी तक़दीर को रो आए

अपनी हस्ती ही से हो जो कुछ हो
आगही गर नहीं ग़फ़लत ही सही

अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यूँ तेरा घर मिले

 

करने गए थे उस से तग़ाफ़ुल का हम गिला


करने गए थे उस से तग़ाफ़ुल का हम गिला
बस एक ही निगाह की बस ख़ाक हो गए

 

Ek to teri aawaz yaad aayegi


Ek to teri aawaz yaad aayegi,
Teri kahi huwi har baat yaad aayegi,
Din dhal jayega raat yaad aayegi,
Har lamha pahli mulakat yaad aayegi.

 

Aaina Dekh Apna Sa Munh Le Ke Reh Gaye


Aaina Dekh Apna Sa Munh Le Ke Reh Gaye,
Sahab Ko Dil Na Dene Pe Kitna Guroor Tha.
आईना देख के अपना सा मुँह लेके रह गए,
साहब को दिल न देने पे कितना गुरूर था।

 

हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले


हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान , लेकिन फिर भी कम निकले

 

Aata hai daagh-e-hasrat-e-dil ka shumaar yaad


Aata hai daagh-e-hasrat-e-dil ka shumaar yaad
mujh se mire gunah ka hisaab ai khuda na maang

बे-वजह नहीं रोता इश्क़ में कोई ग़ालिब


बे-वजह नहीं रोता इश्क़ में कोई ग़ालिब
जिसे खुद से बढ़ कर चाहो वो रूलाता ज़रूर है

 

तुम सलामत रहो हजार बरस


तुम सलामत रहो हजार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हजार

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

Jab ki tujh bin nahi koi maujood


Jab ki tujh bin nahi koi maujood
fir ye hangama ai khuda kya hai

 

हुई मुद्दत के ग़ालिब मर गया


हुई मुद्दत के ग़ालिब मर गया, पर याद आती है
जो हर एक बात पे कहना की यूं होता तो क्या होता

 

Kaun hai jo nahi hai haazat-mand


Kaun hai jo nahi hai haazat-mand
kis kee haazat ravaa kare koi

 

Hathoon key lakiroon pay matt jaa ae Ghalib


Hathoon key lakiroon pay matt jaa ae Ghalib,
Naseeb unkay bhi hotay hain jinkaay haath nahi hotay …

Kaiday-hayaat, banday-gham asal may dono eik hain,
Maut say pahlay aadmey gham say nigaat paye kyun ?

Matt poonch key kya haal hai mera tere pechhee,
Tu dekh key kya rangg hai tera meray aagay … 

Hazaroon khwaheeshen aise ki har khwahesh pay dum nikale, 
Bahhut nikale meray armaan lekin phirr bhi kam nikale …

Nazzaare nay bhe kaam kiya waan naqaabb ka, 
Mastey say harr nigaah terey Rukhh par bikharr gaye … 

 

De mujh ko shikaayat kee ijaazat ki sitamgar


De mujh ko shikaayat kee ijaazat ki sitamgar
kuchh tujh ko mazaa bhi mire aazaar mein aave

 

“ग़ालिब” छूटी शराब पर अब भी कभी कभी


“ग़ालिब” छूटी शराब पर अब भी कभी कभी ,
पीता हूँ रोज़ -ऐ -अबरो शब -ऐ -महताब में

 

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन


हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को “ग़ालिब” यह ख्याल अच्छा है


Mirza ghalib shayari collection (2)


ग़ालिब ‘ हमें न छेड़ की फिर जोश -ऐ -अश्क से


ग़ालिब ‘ हमें न छेड़ की फिर जोश -ऐ -अश्क से
बैठे हैं हम तहय्या -ऐ -तूफ़ान किये हुए

 

Bazicha-e-Atfal Hai Duniya Mere Aage


Bazicha-e-Atfal Hai Duniya Mere Aage,
Hota Hai Shab-o-Roz Tamasha Mere Aage.
बाज़ीचा-ए-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज तमाशा मेरे आगे।

 

कितने शिरीन हैं तेरे लब के रक़ीब


कितने शिरीन हैं तेरे लब के रक़ीब
गालियां खा के बेमज़ा न हुआ
कुछ तो पढ़िए की लोग कहते हैं
आज ‘ग़ालिब ‘ गजलसारा न हुआ

 

Ishq ne ‘Ghalib’ nikamma kar diya


Ishq ne ‘Ghalib’ nikamma kar diya
varna ham bhi aadmi the kaam ke

Aashiq hoon pe maashooq-farebi hai mira kaam


Aashiq hoon pe maashooq-farebi hai mira kaam
majnuun ko bura kahti hai laila mere aage

 

थी खबर गर्म के ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े


थी खबर गर्म के ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े ,
देखने हम भी गए थे पर तमाशा न हुआ

 

Ishq ne ‘Ghalib’ nikamma kar diya


Ishq ne ‘Ghalib’ nikamma kar diya
varna ham bhi aadmi the kaam ke

 

ज़रा कर जोर सीने पर की तीर -ऐ-पुरसितम् निकले जो


ज़रा कर जोर सीने पर की तीर -ऐ-पुरसितम् निकले जो
वो निकले तो दिल निकले , जो दिल निकले तो दम निकले

 

वफ़ा के ज़िक्र में ग़ालिब मुझे गुमाँ हुआ


वफ़ा के ज़िक्र में ग़ालिब मुझे गुमाँ हुआ
वो दर्द इश्क़ वफाओं को खो चूका होगा ,

जो मेरे साथ मोहब्बत में हद -ऐ -जूनून तक था
वो खुद को वक़्त के पानी से धो चूका होगा ,

मेरी आवाज़ को जो साज़ कहा करता था
मेरी आहोँ को याद कर के सो चूका होगा ,

वो मेरा प्यार , तलब और मेरा चैन -ओ -क़रार
जफ़ा की हद में ज़माने का हो चूका होगा ,

तुम उसकी राह न देखो वो ग़ैर था साक़ी
भुला दो उसको वो ग़ैरों का हो चूका होगा !

Etibar-e-ishq kee khana-kharaabi dekhna


Etibar-e-ishq kee khana-kharaabi dekhna
gair ne kee aah lekin vo khafaa mujh par huye

 

मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब


मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब
यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी

 

Ishq par zor nahi hai ye vo aatash ‘Ghalib’


Ishq par zor nahi hai ye vo aatash ‘Ghalib’
ki lagaaye na lage aur bujhaaye na bane

 

पीने दे शराब मस्जिद में बैठ के , ग़ालिब


पीने दे शराब मस्जिद में बैठ के , ग़ालिब
या वो जगह बता जहाँ खुदा नहीं है

 

‘Ghalib’ chhuti sharaab par ab bhi kabhi-kabhi


‘Ghalib’ chhuti sharaab par ab bhi kabhi-kabhi
peeta huun roz-e-abra o shab-e-maahtaab mein

 

Nuktaa chi hai gam e dil


Nuktaa chi hai gam e dil, key sunayaa na banay,
Kya baat banay wahan, jahan baat banyay na banay,
Ishq par zorr nahi hai yeh woh attissh Ghalib,
Jo lagaye na lagay bhujhaye na banay …

 

कब वो सुनता है कहानी मेरी


कब वो सुनता है कहानी मेरी
और फिर वो भी ज़बानी मेरी

कह सके कौन कि ये जल्वागरी किस की है
पर्दा छोड़ा है वो उस ने कि उठाए न बने

कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

आगही दाम-ए-शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाए
मुद्दआ अन्क़ा है अपने आलम-ए-तक़रीर का

 

पूछते हैं वो की ‘ग़ालिब ‘ कौन है ?


पूछते हैं वो की ‘ग़ालिब ‘ कौन है ?
कोई बतलाओ की हम बतलायें क्या

 

Jee Dhoondta Hai Phir Wahi Fursat Ke Raat Din


Jee Dhoondta Hai Phir Wahi Fursat Ke Raat Din,
Baithe Rahe Tasawwur-e-Janaan Kiye Huye.
जी ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात दिन,
बैठे रहे तसव्वुर-ए-जहान किये हुए।

 

तू तो वो जालिम है जो दिल में रह कर भी मेरा न बन सका , ग़ालिब


तू तो वो जालिम है जो दिल में रह कर भी मेरा न बन सका , ग़ालिब
और दिल वो काफिर, जो मुझ में रह कर भी तेरा हो गया

 

दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई


दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई
दोनों को एक अदा में रजामंद कर गई

मारा ज़माने ने ‘ग़ालिब’ तुम को
वो वलवले कहाँ , वो जवानी किधर गई

 

Aage aati thi haal-e-dil pe hansi


Aage aati thi haal-e-dil pe hansi
ab kisi baat par nahi aati

Chaandni Raat Ke Khamosh Sitaron Ki Qasam


Chaandni Raat Ke Khamosh Sitaron Ki Qasam,
Dil Mein Ab Tere Siwa Koyi Bhi Aabad Nahi.
चांदनी रात के खामोश सितारों की क़सम,
दिल में अब तेरे सिवा कोई भी आबाद नहीं।

 

 

इश्क़ मुझको नहीं वेहशत ही सही


इश्क़ मुझको नहीं वेहशत ही सही
मेरी वेहशत तेरी शोहरत ही सही
कटा कीजिए न तालुक हम से
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही

 

Kahaan may-khaane ka darvaaja ‘Ghalib’ aur kahaan vaaiz


Kahaan may-khaane ka darvaaja ‘Ghalib’ aur kahaan vaaiz
par itna jaante hain kal vo jaata tha ki ham nikle

 

 

दिया है दिल अगर उस को , बशर है क्या कहिये


दिया है दिल अगर उस को , बशर है क्या कहिये

हुआ रक़ीब तो वो , नामाबर है , क्या कहिये

यह ज़िद की आज न आये और आये बिन न रहे
काजा से शिकवा हमें किस क़दर है , क्या कहिये

ज़ाहे -करिश्मा के यूँ दे रखा है हमको फरेब
की बिन कहे ही उन्हें सब खबर है , क्या कहिये

समझ के करते हैं बाजार में वो पुर्सिश -ऐ -हाल
की यह कहे की सर -ऐ -रहगुज़र है , क्या कहिये

तुम्हें नहीं है सर-ऐ-रिश्ता-ऐ-वफ़ा का ख्याल
हमारे हाथ में कुछ है , मगर है क्या कहिये

कहा है किस ने की “ग़ालिब ” बुरा नहीं लेकिन
सिवाय इसके की आशुफ़्तासार है क्या कहिये

 

उल्फ़त पैदा हुई है


उल्फ़त पैदा हुई है , कहते हैं , हर दर्द की दवा
यूं हो हो तो चेहरा -ऐ -गम उल्फ़त ही क्यों न हो

 

Is qadarr tora hai mujhaay uss ke be-wafaai nay “ghalib”


Is qadarr tora hai mujhaay uss ke be-wafaai nay “ghalib”
Abb koi agarr pyar se bhi daikhaay to bikharr jata hoon mai …

Kitnaa khouff hota hai shaam kay andheroon mein,
Poonch un parindoo say jin kay gharr nahi hotay …

Hum toh fanaah ho gaye uskii ankhen dekh kar Ghalib,
Naa janay woh Aainaa kiasay dekhte hogey …! 

Unkay dekhnay say jo aa jaati hai muh par raunaqq,
Woh samajhatey hai ki bimaar ka haal achcha hai …

Dil say terey nigaah jigarr tak utarr gaye, 
Dono ko eik adaa mein razaamand karr gaye …

 

Ishq par zor nahi hai ye vo aatash ‘Ghalib’


Ishq par zor nahi hai ye vo aatash ‘Ghalib’
ki lagaaye na lage aur bujhaaye na bane

 

Aashiqi Sabr Talab Aur Tamanna Betab


Aashiqi Sabr Talab Aur Tamanna Betab,
Dil Ka Kya Rang Karun Khoon-E-Jigar Hone Tak.
आशिकी सब्र तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होने तक।

 

गम -ऐ -हस्ती का असद किस से हो जूझ मर्ज इलाज


गम -ऐ -हस्ती का असद किस से हो जूझ मर्ज इलाज
शमा हर रंग मैं जलती है सहर होने तक ..

 

तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब


तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब
के सारी उम्र अपना क़सूर ढूँढ़ते रहे

 

बहुत सही गम -ऐ -गति शराब कम क्या है


बहुत सही गम -ऐ -गति शराब कम क्या है
गुलाम -ऐ-साक़ी -ऐ -कौसर हूँ मुझको गम क्या है
तुम्हारी तर्ज़ -ओ -रवीश जानते हैं हम क्या है
रक़ीब पर है अगर लुत्फ़ तो सितम क्या है
सुख में खमा -ऐ -ग़ालिब की आतशफशनि
यकीन है हमको भी लेकिन अब उस में दम क्या है

 

Thee khabar garm ki ‘Ghalib’ ke udenge purje


Thee khabar garm ki ‘Ghalib’ ke udenge purje
dekhne ham bhi gaye the pa tamasha na hua

 

वादे पे वो ऐतबार नहीं करते


वादे पे वो ऐतबार नहीं करते,
हम जिक्र मौहब्बत सरे बाजार नहीं करते,
डरता है दिल उनकी रुसवाई से,
और वो सोचते हैं हम उनसे प्यार नहीं करते |

 

इश्क़ पर जोर नहीं


इश्क़ पर जोर नहीं , यह तो वो आतिश है, ग़ालिब
के लगाये न लगे और बुझाए न बुझे

 

Qaasid ke aate-aate khat ik aur likh rakhuun


Qaasid ke aate-aate khat ik aur likh rakhuun
mai jaanta huun jo vo likhenge jawaab mein

 

खुदा के वास्ते पर्दा न रुख्सार से उठा ज़ालिम


खुदा के वास्ते पर्दा न रुख्सार से उठा ज़ालिम
कहीं ऐसा न हो जहाँ भी वही काफिर सनम निकले

 

नादान हो जो कहते हो क्यों जीते हैं


नादान हो जो कहते हो क्यों जीते हैं “ग़ालिब “
किस्मत मैं है मरने की तमन्ना कोई दिन और

 

‘Ghalib’ bura na maan jo vaaiz bura kahe


‘Ghalib’ bura na maan jo vaaiz bura kahe
aisa bhi koi hai ki sab achchha kahen jise

 

Na tha kuchh to khudaa tha


Na tha kuchh to khudaa tha, kuchh naa hota to khudaa hota,
Dubayaa mujhko honay ne, na hota main toh kya hota ?
Hua jab ghamm say yoon behiss to ghamm kya sarr kay katnay ka,
Na hota gar juda tann say to zanoo par dharaa hota,
Huye muddat key ghalib marr gaya par yaad aata hai,
Har ek baat par kahnaa key yun hota to kya hota …

 

निकलना खुद से आदम का सुनते आये हैं लकिन


निकलना खुद से आदम का सुनते आये हैं लकिन
बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले

 

Qat’a keejiye na taalluk ham se


Qat’a keejiye na taalluk ham se
kuchh nahi hai to adaavat hi sahi

 

Apni gali men mujhko na kar dafn baad-e-qatl


Apni gali men mujhko na kar dafn baad-e-qatl
mere pate se khalq ko kyuun tera ghar mile

 

Is saadgi pe kaun na mar jaaye ai khuda


Is saadgi pe kaun na mar jaaye ai khuda
ladte hain aur haath mein talwaar bhi nahi

 

लाज़िम था के देखे मेरा रास्ता कोई दिन और


लाज़िम था के देखे मेरा रास्ता कोई दिन और
तनहा गए क्यों , अब रहो तनहा कोई दिन और

 

Is nazaaqat ka bura ho vo bhale hain to kya


Is nazaaqat ka bura ho vo bhale hain to kya
haath aave to unhe haath lagaaye na bane

 

फिर उसी बेवफा पे मरते हैं


फिर उसी बेवफा पे मरते हैं
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है
बेखुदी बेसबब नहीं ‘ग़ालिब’
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है

 

Is saadgi pe kaun na mar jaaye ai khuda


Is saadgi pe kaun na mar jaaye ai khuda
ladte hain aur haath mein talwaar bhi nahi

 

क़ासिद के आते -आते खत एक और लिख रखूँ


क़ासिद के आते -आते खत एक और लिख रखूँ
मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब


Mirza ghalib shayari collection (1)

Kee mire qatl ke baad us ne jafaa se tauba


Kee mire qatl ke baad us ne jafaa se tauba
haaye us zood-pasheemaan ka pasheemaan hona

आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक


आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी जुलफ के सर होने तक

हमने माना की तग़ाफ़ुल न करेंगे लेकिन
खाक हो जायगे हम तुम्हे खबर होने तक

आशिक़ी सब्र -तलब और तमना बेताब
दिल का क्या रंग करू, खून-ऐ-जिगर होने तक

कोई दिन गर ज़िंदगानी और है


कोई दिन गर ज़िंदगानी और है

अपने जी में हमने ठानी और है

आतिश -ऐ -दोज़ख में ये गर्मी कहाँ
सोज़-ऐ -गम है निहानी और है

बारह देखीं हैं उन की रंजिशें ,
पर कुछ अब के सरगिरानी और है

देके खत मुँह देखता है नामाबर ,
कुछ तो पैगाम -ऐ -ज़बानी और है

हो चुकीं ‘ग़ालिब’ बलायें सब तमाम ,
एक मर्ग -ऐ -नागहानी और है .

Karz kee peete the may lekin samajhte the ki haan


Karz kee peete the may lekin samajhte the ki haan
rang laavegi hamaari faaka-masti ek din

रात है ,सनाटा है , वहां कोई न होगा, ग़ालिब


रात है ,सनाटा है  वहां कोई न होगा, ग़ालिब
चलो उन के दरो -ओ -दीवार चूम के आते हैं

चंद तस्वीर-ऐ-बुताँ , चंद हसीनों के खतूत


चंद तस्वीर-ऐ-बुताँ , चंद हसीनों के खतूत .

बाद मरने के मेरे घर से यह सामान निकला

वो आये घर में हमारे , खुदा की कुदरत है


वो आये घर में हमारे , खुदा की कुदरत है
कभी हम उन्हें कभी अपने घर को देखते है

Tum jaano tum ko gair se jo rasm-o-raah ho


Tum jaano tum ko gair se jo rasm-o-raah ho
mujh ko bhi poochhte raho to kya gunaah ho

आज वाँ तेग़ ओ कफ़न बाँधे हुए जाता हूँ मैं


आज वाँ तेग़ ओ कफ़न बाँधे हुए जाता हूँ मैं
उज़्र मेरे क़त्ल करने में वो अब लावेंगे क्या

काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शर्म तुम को मगर नहीं आती

काफ़ी है निशानी तिरा छल्ले का न देना
ख़ाली मुझे दिखला के ब-वक़्त-ए-सफ़र अंगुश्त

आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
मुझ से मिरे गुनह का हिसाब ऐ ख़ुदा न माँग

Kaaba kis munh se jaaoge ‘Ghalib’


Kaaba kis munh se jaaoge ‘Ghalib’
sharm tum ko magar nahi aati

यूं तो हम हिज़र में भी दीवार -ओ -दर को देखते हैं


यूं तो हम हिज़र में भी दीवार -ओ -दर को देखते हैं
कभी सबा को कभी नामाबर को देखते हैं
वो आये घर में हमारे खुदा की कुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं

कहते हुए साक़ी से हया आती है वर्ना


कहते हुए साक़ी से हया आती है वर्ना
है यूँ कि मुझे दुर्द-ए-तह-ए-जाम बहुत है

आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना ‘ग़ालिब’
किस के घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बअ’द

आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए
साहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे

हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की किस्मत ग़ालिब


हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की किस्मत ग़ालिब
जिस की किस्मत में हो आशिक़ का गरेबां होना

Kitne sheereen hain tere lab ki raqeeb


Kitne sheereen hain tere lab ki raqeeb
gaaliyaan kha ke be-mazaa na hua

मेह वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ऐ-ग़ैर में या रब


मेह वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ऐ-ग़ैर में या रब
आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहान अपना
मँज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकते “ग़ालिब”
अर्श से इधर होता काश के माकन अपना

आज फिर इस दिल में बेक़रारी है


आज फिर इस दिल में बेक़रारी है
सीना रोए ज़ख्म-ऐ-कारी है
फिर हुए नहीं गवाह-ऐ-इश्क़ तलब
अश्क़-बारी का हुक्म ज़ारी है
बे-खुदा , बे-सबब नहीं , ग़ालिब
कुछ तो है जिससे पर्दादारी है

फिर तेरे कूचे को जाता है ख्याल


फिर तेरे कूचे को जाता है ख्याल
दिल -ऐ -ग़म गुस्ताख़ मगर याद आया
कोई वीरानी सी वीरानी है .
दश्त को देख के घर याद आया

दुःख दे कर सवाल करते हो


दुःख दे कर सवाल करते हो
तुम भी ग़ालिब कमल करते हो

देख कर पूछ लिया हाल मेरा
चलो कुछ तो ख्याल करते हो

शहर-ऐ-दिल में उदासियाँ कैसी
यह भी मुझसे सवाल करते हो

मारना चाहे तो मर नहीं सकते
तुम भी जिन मुहाल करते हो

अब किस किस की मिसाल दू में तुम को
हर सितम बे-मिसाल करते हो

Tire vaade par jiye ham to ye jaan jhoot jaana


Tire vaade par jiye ham to ye jaan jhoot jaana
ki khushi se mar na jaate agar etibaar hota

अदा-ए-ख़ास से ‘ग़ालिब’ हुआ है नुक्ता-सरा


अदा-ए-ख़ास से ‘ग़ालिब’ हुआ है नुक्ता-सरा
सला-ए-आम है यारान-ए-नुक्ता-दाँ के लिए

इस नज़ाकत का बुरा हो वो भले हैं तो क्या
हाथ आवें तो उन्हें हाथ लगाए न बने

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

कुछ तो पढ़िए कि लोग कहते हैं
आज ‘ग़ालिब’ ग़ज़ल-सरा न हुआ

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