100 + Best collection of Krishna Bihari (Noor) shayari and ghazal

krishna bihari lal

Krishna Bihari Noor Best Ghazal

 

धुन ये है आम तेरी


धुन ये है आम तेरी रहगुज़र होने तक
हम गुज़र जाएँ ज़माने को ख़बर होने तक

मुझको अपना जो बनाया है तो एक और करम
बेख़बर कर दे ज़माने को ख़बर होने तक

अब मोहब्बत की जगह दिल में ग़मे-दौरां है
आइना टूट गया तेरी नज़र होने तक

ज़िन्दगी रात है मैं रात का अफ़साना हूँ
आप से दूर ही रहना है सहर होने तक

ज़िन्दगी के मिले आसार तो कुछ ज़िन्दा में
सर ही टकराईये दीवार में दर होने तक

krishna bihari lal nnor shayari and ghazal

 

laakh gham seene se


laakh gham seene se lipate rahe naagan kee tarah
pyaar sachchaa thaa mahakataa rahaa chandan kee tarah

tujhko pahchaan liya tujhe paa bhi loonga
ik janam aur mile agar isee jeevan kee tarah

koi tahreer nahiin hai jise padh le koii
zindagi ho gaii hai be-naam see uljhan kee tarah

jaise dharatee kee kisi shai se ta-alluk hee nahiin
ho gayaa pyaar tere bhii tere daaman kee tarah

muskuraate ho magar soch lo itna ai ‘Noor’
sood leti hai masarrat bhii mahaajan kee tarah

 

गुज़रे जिधर जिधर से वो 


गुज़रे जिधर जिधर से वो पलटे हुए नक़ाब
इक नूर की लकीर-सी खिंचती चली गई।
देखा जो उन्हें सर भी झुकाना न रहा याद
दरअसल नमाज़ आज अदा हमसे हुई है

 

वो लब कि जैसे साग़रे-सहबा दिखाई दे


वो लब कि जैसे साग़रे-सहबा दिखाई दे
जुंबिश जो हो तो जाम छलकता दिखाई दे

उस तश्नालब की नींद न टूटे, खु़दा करे
जिस तश्नालब को ख़्वाब में दरिया दिखाई दे

कहने को उस निगाह के मारे हुए हैं सब
कोई तो उस निगाह का मारा दिखाई दे

दरिया में यूँ तो होते हैं क़तरे-ही-क़तरे सब
क़तरा वही है जिसमें कि दरिया दिखाई दे

खाये न जागने की क़सम वो तो क्या करे
जिसको हर एक ख़्वाब अधूरा दिखाई दे

क्यों आइना कहें उसे, पत्थर न क्यों कहें
जिस आइने में अक्स न उनका दिखाई दे

क्या हुस्न है, जमाल है, क्या रंग-रूप है
वो भीड़ में भी जाये तो तनहा दिखाई दे

फिरता हूँ शहरों-शहरों समेटे हर एक याद
अपना दिखाई दे न पराया दिखाई दे

पूछूँ कि मेरे बाद हुआ उनका हाल क्या
कोई जो उस जनम का शनासा दिखाई दे

कैसी अजीब शर्त है दीदार के लिये
आँखें जो बंद हों तो वो जलवा दिखाई दे

ऎ ‘नूर’ यूँ ही तर्के-मुहब्बत में क्या मज़ा
छोड़ा है जिसको वो भी तो तनहा दिखाई दे

 

अपना पता न अपनी ख़बर छोड़ जाऊँगा


अपना पता न अपनी ख़बर छोड़ जाऊँगा
बे-सम्तियों की गर्द-ए-सफ़र छोड़ जाऊँगा
तुझ से अगर बिछड़ भी गया मैं तो याद रख
चेहरे पे तेरे अपनी नज़र छोड़ जाऊँगा
ग़म दूरियों का दूर न हो पाएगा कभी
वो अपनी क़ुर्बतों का असर छोड़ जाऊँगा
गुज़रेगी रात रात मिरे ही ख़याल में
तेरे लिए मैं सिर्फ़ सहर छोड़ जाऊँगा
जैसे कि शम्अ-दान में बुझ जाए कोई शम्अ’
बस यूँ ही अपने जिस्म का घर छोड़ जाऊँगा
मैं तुझ को जीत कर भी कहाँ जीत पाऊँगा
लेकिन मोहब्बतों का हुनर छोड़ जाऊँगा
आँसू मिलेंगे मेरे न फिर तेरे क़हक़हे
सूनी हर एक राहगुज़र छोड़ जाऊँगा
संसार में अकेला तुझे अगले जन्म तक
है छोड़ना मुहाल मगर छोड़ जाऊँगा
उस पार जा सकेंगी तो यादें ही जाएँगी
जो कुछ इधर मिला है उधर छोड़ जाऊँगा
ग़म होगा सब को और जुदा होगा सब का ग़म
क्या जाने कितने दीदा-ए-तर छोड़ जाऊँगा
बस तुम ही पा सकोगे कुरेदोगे तुम अगर
मैं अपनी राख में भी शरर छोड़ जाऊँगा
कुछ देर को निगाह ठहर जाएगी ज़रूर
अफ़्साने में इक ऐसा खंडर छोड़ जाऊँगा
कोई ख़याल तक भी न छू पाएगा मुझे
ये चारों सम्त आठों पहर छोड़ जाऊँगा

 

इक ग़ज़ल उस पे लिखूँ दिल का तकाज़ा है बहुत


इक ग़ज़ल उस पे लिखूँ दिल का तकाज़ा है बहुत
इन दिनों ख़ुद से बिछड़ जाने का धड़का है बहुत

रात हो दिन हो ग़फ़लत हो कि बेदारी हो
उसको देखा तो नहीं है उसे सोचा है बहुत

तश्नगी के भी मुक़ामात हैं क्या क्या यानी
कभी दरिया नहीं काफ़ी, कभी क़तरा है बहुत

मेरे हाथों की लकीरों के इज़ाफ़े हैं गवाह
मैं ने पत्थर की तरह ख़ुद को तराशा है बहुत

कोई आया है ज़रूर और यहाँ ठहरा भी है
घर की दहलीज़ पे ऐ ‘नूर’ उजाला है बहुत

 

ये लम्हा ज़ीस्त का बस आख़िरी है और मैं हूं


ये लम्हा ज़ीस्त का बस आख़िरी है और मैं हूं
हर एक सम्त से अब वापसी है और मैं हूं

हयात जैसे ठहर सी गयी हो ये ही नहीं
तमाम बीती हुई ज़िन्दगी है और मैं हूं

मिरे वुजूद को अपने में जज़्ब करती हुई
नई-नई सी कोई रौशनी है और मैं हूं

मुक़ाबिल अपने कोई है ज़ुरूर कौन है वो
बिसाते-दहर है, बाज़ी बिछी है और मैं हूं

अकेला इश्क़ है हिज्रो-विसाल कुछ भी नहीं
बस एक आलमे-दीवानगी है और मैं हूं

किसी मक़ाम पे रुकने को जी नहीं करता
अजीब प्यास, अजब तिश्नगी है और मैं हूं

जहां न सुख का हो अहसास और न दुख की कसक
उसी मक़ाम पे अब शायरी है और मैं हूं

 

तमाम जिस्म ही घायल था, घाव ऐसा था


तमाम जिस्म ही घायल था, घाव ऐसा था
कोई न जान सका, रख-रखाव ऐसा था

बस इक कहानी हुई ये पड़ाव ऐसा था
मेरी चिता का भी मंज़र अलाव ऐसा था

वो हमको देखता रहता था, हम तरसते थे
हमारी छत से वहाँ तक दिखाव ऐसा था

कुछ ऐसी साँसें भी लेनी पड़ीं जो बोझल थीं
हवा का चारों तरफ से दबाव ऐसा था

ख़रीदते तो ख़रीदार ख़ुद ही बिक जाते
तपे हुए खरे सोने का भाव ऐसा था

हैं दायरे में क़दम ये न हो सका महसूस
रहे-हयात में यारो घुमाव ऐसा था

कोई ठहर न सका मौत के समन्दर तक
हयात ऐसी नदी थी, बहाव ऐसा था

बस उसकी मांग में सिंदूर भर के लौट आए
हमारा अगले जनम का चुनाव ऐसा था

फिर उसके बाद झुके तो झुके ख़ुदा की तरफ़
तुम्हारी सम्त हमारा झुकाव ऐसा था

वो जिसका ख़ून था वो भी शिनाख्त कर न सका
हथेलियों पे लहू का रचाव ऐसा था

ज़बां से कुछ न कहूंगा, ग़ज़ल ये हाज़िर है
दिमाग़ में कई दिन से तनाव ऐसा था

फ़रेब दे ही गया ‘नूर’ उस नज़र का ख़ुलूस
फ़रेब खा ही गया मैं, सुभाव ऐसा था

 

ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं


ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,
और क्या जुर्म है पता ही नहीं।

इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं,
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं|

ज़िन्दगी! मौत तेरी मंज़िल है
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं।

सच घटे या बड़े तो सच न रहे,
झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं।

ज़िन्दगी! अब बता कहाँ जाएँ
ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं।

जिसके कारण फ़साद होते हैं
उसका कोई अता-पता ही नहीं।

धन के हाथों बिके हैं सब क़ानून
अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं।

कैसे अवतार कैसे पैग़म्बर
ऐसा लगता है अब ख़ुदा ही नहीं।

उसका मिल जाना क्या, न मिलना क्या
ख्वाब-दर-ख्वाब कुछ मज़ा ही नहीं।

जड़ दो चांदी में चाहे सोने में,
आईना झूठ बोलता ही नहीं।

अपनी रचनाओं में वो ज़िन्दा है
‘नूर’ संसार से गया ही नहीं।

 

अपने होने का सुबूत और निशाँ छोड़ती है


अपने होने का सुबूत और निशाँ छोड़ती है
रास्ता कोई नदी यूँ ही कहाँ छोड़ती है

नशे में डूबे कोई, कोई जिए, कोई मरे
तीर क्या क्या तेरी आँखों की कमाँ छोड़ती है

बंद आँखों को नज़र आती है जाग उठती हैं
रौशनी एसी हर आवाज़-ए-अज़ाँ छोड़ती है

खुद भी खो जाती है, मिट जाती है, मर जाती है
जब कोई क़ौम कभी अपनी ज़बाँ छोड़ती है

आत्मा नाम ही रखती है न मज़हब कोई
वो तो मरती भी नहीं सिर्फ़ मकाँ छोड़ती है

एक दिन सब को चुकाना है अनासिर का हिसाब
ज़िन्दगी छोड़ भी दे मौत कहाँ छोड़ती है

मरने वालों को भी मिलते नहीं मरने वाले
मौत ले जा के खुदा जाने कहाँ छोड़ती है

ज़ब्त-ए-ग़म खेल नहीं है अभी कैसे समझाऊँ
देखना मेरी चिता कितना धुआँ छोड़ती है

 

यारो घिर आई शाम, चलो मयकदे चलें


यारो घिर आई शाम, चलो मयकदे चलें
याद आ रहे हैं जाम, चलो मयकदे चलें

दैरो-हरम पे खुल के जहाँ बात हो सके
है एक ही मुक़ाम, चलो मयकदे चलें

अच्छा, नहीं पियेंगे जो पीना हराम है
जीना न हो हराम, चलो मयकदे चलें

यारो जो होगा देखेंगे, ग़म से तो हो निजात
लेकर ख़ुदा का नाम, चलो मयकदे चलें

साकी़ भी है, शराब भी, आज़ादियाँ भी हैं
सब कुछ है इंतज़ाम, चलो मयकदे चलें

ऐसी फ़ज़ा में लुत्फ़े-इबादत न आएगा
लेना है उसका नाम, चलो मयकदे चलें

फ़ुरसत ग़मों से पाना अगर है तो आओ ‘नूर’
सबको करें सलाम, चलो मयकदे चलें

 

उससे अपना ग़म कहकर


उससे अपना ग़म कहकर किस क़दर हूँ शर्मिन्दा 
मैं तो एक क़तरा हूँ और वह समन्दर है

हज़ार ग़म सही दिल में मगर ख़ुशी यह है,
हमारे होंठों पे माँगी हुई हँसी तो नहीं 

जबीं को दर पे झुकाना ही बन्दगी तो नहीं
ये देख, मेरी मुहब्बत में कुछ कमी तो नहीं।

 

बस एक वक़्त का ख़ंजर मेरी तलाश में है


बस एक वक़्त का ख़ंजर मेरी तलाश में है
जो रोज़ भेस बदल कर मेरी तलाश में है

ये और बात कि पहचानता नहीं मुझे
सुना है एक सितमग़र मेरी तलाश में है

अधूरे ख़्वाबों से उकता के जिसको छोड़ दिया
शिकन नसीब वो बिस्तर मेरी तलाश में है

ये मेरे घर की उदासी है और कुछ भी नहीं
दिया जलाये जो दर पर मेरी तलाश में है

अज़ीज़ मैं तुझे किस कदर कि हर एक ग़म
तेरी निग़ाह बचाकर मेरी तलाश में है

मैं एक कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है

मैं देवता की तरह क़ैद अपने मंदिर में
वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है

मैं जिसके हाथ में इक फूल देके आया था
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है

वो जिस ख़ुलूस की शिद्दत ने मार डाला ‘नूर’
वही ख़ुलूस मुकर्रर मेरी तलाश में है

 

ये किस ख़ता की सज़ा में


ये किस ख़ता की सज़ा में हैं दोहरी जंजीरें
गिरफ़्त मौत की है ज़िन्दगी की क़ैद में हूँ

शराब मेरे लबों को तरस रही होगी,
मैं रिन्द तो हूँ मगर तिश्नगी की क़ैद में हूँ

किसी के रुख़ से जो पर्दा उठा दिया मैंने
सज़ा ये पाई कि दीवानगी की क़ैद में हूँ

न जाने कितनी नकाबें उलटता जाता हूँ
जनम जनम से मैं बेचेहरगी की क़ैद में हूँ

 

आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझ में|


आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझ में|
और फिर मानना पड़ता है के ख़ुदा है मुझ में|

अब तो ले-दे के वही शख़्स बचा है मुझ में,
मुझ को मुझ से जुदा कर के जो छुपा है मुझ में|

मेरा ये हाल उभरती हुई तमन्ना जैसे,
वो बड़ी देर से कुछ ढूंढ रहा है मुझ में|

जितने मौसम हैं सब जैसे कहीं मिल जायें,
इन दिनों कैसे बताऊँ जो फ़ज़ा है मुझ में|

आईना ये तो बताता है के मैं क्या हूँ लेकिन,
आईना इस पे है ख़मोश के क्या है मुझ में|

अब तो बस जान ही देने की है बारी ऐ “नूर”,
मैं कहाँ तक करूँ साबित के वफ़ा है मुझ में|

 

नज़र मिला न सके उससे उस निगाह के बाद।


नज़र मिला न सके उससे उस निगाह के बाद।
वही है हाल हमारा जो हो गुनाह के बाद।

मैं कैसे और किस सिम्त मोड़ता ख़ुद को,
किसी की चाह न थी दिल में, तिरी चाह के बाद।

ज़मीर काँप तो जाता है, आप कुछ भी कहें,
वो हो गुनाह से पहले, कि हो गुनाह के बाद।

कहीं हुई थीं तनाबें तमाम रिश्तों की,
छुपाता सर मैं कहाँ तुम से रस्म-ओ-राह के बाद।

गवाह चाह रहे थे, वो मिरी बेगुनाही का,
जुबाँ से कह न सका कुछ, ‘ख़ुदा गवाह’ के बाद।

100 + Best collection of Krishna Bihari (Noor) shayari and ghazal

Krishna bihari noor best two line shayari

हर एक पेड़ से साये की आरज़ू न करो
जो धूप में नहीं रहते वो छाँव क्या देंगे


किसी के रुख़ से जो परदा उठा दिया मैंने
सज़ा ये पाई कि दीवानगी की क़ैद में हूँ


आईना ये तो बताता है मैं क्या हूँ लेकिन
आईना इस में है ख़ामोश कि क्या है मुझमें


ये जिस्म सबकी आँखों का मरकज़ बना हुआ
बारिश में जैसे ताजमहल भीगता हुआ


ज़मीर काँप तो जाता है आप कुछ भी कहें
वो हो गुनाह से पहले कि हो गुनाह के बाद


मैं तो अपने कमरे में तेरे ध्यान में गुम था
घर के लोग कहते हैं सारा घर महकता था


उस से अपना ग़म कह कर किस क़दर हूँ शर्मिन्दा
मैं तो एक क़तरा हूँ और वो समन्दर है


तुझसे अगर बिछड़ भी गया मैं तो याद रख
चेहरे पर तेरे अपनी नज़र छोड़ जाऊँगा


ये किस मुक़ाम पे ले आई जुस्तजू* तेरी
कोई चिराग़ नहीं, और रौशनी है बहुत


शख़्स मामूली वो लगता था मगर ऐसा न था
सारी दुनिया जेब में थी, हाथ में पैसा न था


हज़ार ग़म सही दिल में मगर ख़ुशी यह है
हमारे होंठों पे माँगी हुई हँसी तो नहीं


बेतअल्लुक़ी उसकी कितनी जानलेवा है
आज हाथ में उसके फूल है न पत्थर है।


मैं जिस हुनर से हूँ पोशीदा* अपनी ग़ज़लों में
उसी तरह वो छुपा सारी कायनात में है


ग़रज़ कि नसीब में लिखी रही असीरी ही
किसी की क़ैद से छूटा किसी की क़ैद में हूँ।


मैं तो छोटा हूँ झुका दूँगा कभी भी अपना सर
सब बड़े ये तय तो कर लें – कौन है सब से बड़ा


किस तरह मैं देखूँ भी बातें भी करूँ तुमसे
आँख अपना मज़ा चाहे दिल अपना मज़ा चाहे।


जहाँ मैं क़ैद से छूटूँ वहीं पे मिल जाना
अभी न मिलना, अभी ज़िन्दगी की क़ैद में हूँ


जन्म जन्म का चक्कर इक अजीब चक्कर है
कश्तियाँ हैं ख़्वाबों की, नींद का समन्दर है।


हुई जो जश्ने-बहाराँ के नाम से मन्सूब
ये आशियानों के जलने की रौशनी तो नहीं


तेरे जलवों के आगे हिम्मते शरहो बयाँ रख दी
ज़ुबाने बे-निगह रख दी निगाहे-बेज़ुबाँ रख दी।


शख़्स मामूली वो लगता था, मगर ऐसा न था
सारी दुनिया जेब में थी, हाथ में पैसा न था


हो किस तरह से बयाँ तेरे हुस्न का आलम
ज़ुबाँ नज़र तो नहीं है नज़र ज़ुबाँ तो नहीं


इतना बहुत है तुमसे निगाहें मिली रहें
अब बस करो शराब न दो, मैं नशे में हूँ


बेतअल्लुक़ी उसकी कितनी जानलेवा है
आज हाथ में उस के फूल है न पत्थर है


लब क्या बताएँ कितनी अज़ीम उसकी ज़ात है
सागर को सीपियों से उलटने की बात है


मैं जिसके हाथ में एक फूल देके आया था
उसी के हाथ का खंजर मेरी तलाश में है


मैं एक क़तरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है
हुआ करे जो समन्दर मेरी तलाश में है


तमाम जिस्म ही घायल था घाव ऐसा था
कोई न जान सका रखरखाव ऐसा था


अपनी पलकों से उस के शरारे उठा
ओस की उँगलियों से शरारे उठा


तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो
तुमको देखूँ कि तुमसे बात करूँ


मुद्दत से एक रात भी अपनी नहीं हुई
हर शाम कोई आया उठा ले गया मुझे


अपनी पलकों से उसके इशारे उठा
ओर की उँगलियों से शरारे उठा


जहाँ न सुख का हो अहसास और न दुख की कसक
उसी मुक़ाम पे अब शायरी है और मैं हूँ


मैं जानता हूँ वो क्यों मुझसे रूठ जाते हैं
वो इस तरह से भी मेरे क़रीब आते हैं


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