Khoon peene waali dayan ki darawani kahani

Khoon peene waali dayan ki darawani kahani
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Khoon peene waali dayan ki darawani kahani


किसी गांव में एक बुढि़या रहती थी। उसके यहां सात पुत्र ओर एक पुत्री थी। सातों भाई धन कमाने के लिए मां से विदा लेकर एक जंगल में जाकर रहने लगे। वहां से वे सातों लकडि़यां काटकर लाते ओर उन्हें शहर में बेच कर आते। इस प्रकार से वे लकडि़यों का व्यापार करने लगे। फिर एक दिन राखी का त्यौहार आया।

उस लड़की ने कहा, मां, मै सात भाईयों की बहन हूँ मगर इस त्यौहार पर मेरे एक भी भाई नहीं हैं और न ही उनकी कोई खबर हैं। सभी बहनें अपने भाईयों को राखी बांध रहीं। मैं भी अपने भाईयों को राखी बांधूगी।

मां बोली, ठीक हैं – बेटी और एक आटे का गोल पहिया बनाकर देती हुई बोली ये ले इसे चलाती जाना और कहना जहां पर मेरे भाई हों वही पर रुकना, चले-चल रे पहिये जहां मेरे भाई हों वही पर रुकना।

Khoon peene waali dayan ki darawani kahani

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इस प्रकार मां से विदा लेकर वह लड़की चल पड़ी। उस पहिये को चलाती जाती और कहती चल से चून के पहिये जहां मेरे भाई हों वहां पर रुकना। उसे चलते शाम हो गई तो वह पहिया वन के एक छोर पर बनी झोपड़ी के चारों ओर चक्कर काटने लगा मगर वह लड़की अब भी वहीं आवाज लगा रही थी। तभी अन्दर से एक भाई ने कहा – मुझे तो बहन की आवाज सनाई देती हैं, तब दूसरा बोला, हमारी बहन यहां कैसे आयेगी ? उसे तो रास्ता भी नहीं मालूम ! तब दूसरे भाई ने बाहर निकल कर देखा तो वास्तव में उनकी बहन थी। बहन को देख कर तो सभी झूम उठे। सभी ने उसे प्रेम से गले लगाया।

दूसरे दिन राखी का त्यौहार था बहन ने भाईयों को राखी बांधी और लंबी आयु की कामना की। भाईयों ने भी बहन की रक्षा करन की कसम ली। उस दिन सभी ने छुट्टी रखी। और सभी ने मौज मस्ती की। परन्तु दूसरे दिन से सभी ने अपना काम शुरु कर दिया। उनकी बहन घर पर ही रहती।

एक दिन की बात हैं। वह कपड़े धो कर सुखा रही थी कि एक डायन की नजर उस पर पड़ी। वह डायन उसे खाने की फिराक में रहती मगर उसे पता था कि यह झोपड़ी सात भाईयों की हैं उन्हें पता चल गया तो वे उसे जिंदा नहीं छोड़ेंगे।

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इसलिए उसने एक युक्ति सोची, उसने अपना भेष बदला और उस लडकी के पास आकर कहने लगी। बेटी तुम्हारा क्या हाल हैं ? मुझे तुम बहुत दिनों में मिली हो इसलिए शायद तुम मुझे नहीं जानती। मैं तुम्हारी मौसी हूँ। यहां पास ही में रहती हूँ। उस डायन ने उसका मन जीतने के लिए हर काम में उसकी मद्द भी की।

इस प्रकार से वह डायन रोज उसके पास आती और उसे किसी तरह से बेहोश करती और उसका खून चूसकर चली जाती।

एक दिन भाईयों ने अपनी बहन से कहा, बहन तुम्हें किस बात की चिंता हैं ? क्या तुम्हें किसी बात की कमी हैं। हम तुझे अच्छा खाना खिलाते हैं। अपना काम भी हम तुमसे नहीं कराते, फिर क्या बात हैं। तुम मोटी क्यों नहीं होती। आई थी उससे भी दुबली-पतली हो गई हो तुम। तब उनकी बहन कहने लगी कि नहीं भईया बस यूँ ही। नहीं बहन तुम हमें बताओ क्या बात हैं। तब बहन कहने लगी जब तुम यहां से चले जाते हो तो यहां पर एक औरत आती हैं और कहती हैं कि मैं तुम्हारी मौसी हूँ। और न जाने मुझे क्या हो जाता हैं और मैं सो जाती हूँ, सो कर उठती हूँ तो वह यहां से चली जाती हैं।

यह सुनकर भाई कहने लगा कि वह तो डायन हैं। वह हमारी बहन का खून चूसने के लिए इसे बेहोश करती हैं। ऐसा करते हैं हम कल छुट्टी करके उस डायन का काम तमाम कर देते हैं। ओर बहन उसे हमारा पता नहीं चलना चाहिए कि हम यहां पर हैं। दूसरे दिन सभी घर के अन्दर एक काने में छुप गए सुबह जब डायन आई तो उसने उस लड़की से कहा कि क्या तुम्हारे सभी भाई बाहर गए ? तो बहन बोली, हां आओ मौसी आजा। मैं आज धोऊँगी। आप मेरी चोटी करना।

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डायन के लिए यह कोई छोटी बात नहीं थी। उसने जल्दी ही उसका सिर धोया ओर चोटी करने के लिए उसे अन्दर ले गई। जब चोटी कर रही थी तो उसने अचानक उस लड़की को बेहोश किया। ओर उसके सिर को खाने के लिए झुकी। तभी सातों भाई, कुल्हाड़ी लेकर अपने कोने से निकल आये ओर उस डायन को मार दिया ओर सभी ने उससे अपना पीछा छुड़ाया। फिर सभी उस जगह को छोड़कर वापिस अपने घर वापिस आ गए।


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