Jo Khud nahi samajte hain wo dusre ko kya samjhayenge

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मन strong हो तो , कुसंग का फर्क नहीं पड़ता

ऐसा हम बचपन से सुनते आये थे , उन लोगो से , जो लोग इस समाज में बुद्धिमान माने जाते थे ,
परंतु किसी ने भी वो method कभी नहीं बताया कि हमारा मन strong बनेगा कैसे ?? क्योंकि इसका जवाब उन लोगो में से किसी के पास था ही नहीं , जो लोग अपने आप को बहुत बुद्धिमान मानते थे …

Jo Khud nahi samajte hain wo dusre ko kya samjhayenge

Jo Khud nahi samajte hain wo dusre ko kya samjhayenge

क्योकि इस समाज मे 99.9% लोग का हाल ही यही है कि

हमने यू ही अपने दिल को बहलाया है,
जो खुद नही समझे,
वो और को समझाया है
???

इसका जवाब दिया , और हमे उस method पर चला कर , अनुभव भी कराया, उस साधू , जिसे ये दुनिया के होशियार कहे जाने वाले लोग, अनपढ़ समझते हैं ..

इंसान के मन को समझने, अनुभव करने के लिये,
खुद को पढ़ने के लिये,
खुदा को पढ़ने के लिये,
जो सबसे पहली योग्यता है — मौन, एकांत, खुद को देखना

और मजे की बात तो ये है कि हमारा पूरा फोकस तो दूसरे लोगो पर रहता है, लोग क्या कर रहे है , लोग क्या कहेंगे, लोगो की निंदा में, लोगो पर आरोप लगा कर बहस करने में

दुनियां को देखने मे इतना खो गए कि खुद का ही पता भूल गए

कभी हमने अपने मन के बारे में ही नही सोचा ??
हमारा मन क्या है ??
हमारा मन चाहता क्या है ??
हमारे मन की जरूरतें क्या है ??
क्यो कमजोर हो गया ??
हमारा मन strong कैसे होगा ??

कोई भी इंसान या जानवर का सरीर , कैसे strong होता हैं ??

यदि हम उसे , उसका स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन दे , उस भोजन को हजम करने के लिये चुरन दे ,

वो खाये , हजम कर ले तो धीरे धीरे strong हो जायेगा

भोजन स्वादिस्ट होना चाहिये (तभी वो अधिक से अधिक खायेगा ) और पौस्टिक भी होना चाहिए, ताकि energy और बाकी जरूरी पोषक तत्व ज्यादा मिले ….

थोड़ी शारीरिक मेहनत कार्य, कसरत और चुरन भी चाहिये, ताकि भोजन हजम भी हो जाय

जब मै इस कथा क्षेत्र में आया तो ,, कथा सुनने में मुझे बहुत मजा , रस , स्वाद नहीं आ रहा था …

तो मानसिक मुलाकात में , मैने अपने संत से प्रश्न कर दिया कि आप तो कथा में कहते हो कि —

कथा श्रवण, मन का स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन हैं ??

कोई भोजन पौष्टिक हैं या नहीं , इसका पता तो कुछ समय बाद लगता हैं , परन्तु स्वाद का पता तो तुरन्त लग जाता हैं

यदि कथा , मन का स्वादिष्ट भोजन हैं तो मुझे स्वाद , मजा क्यो नहीं आ रहा हैं ?? जितना मजा मुझे फ़िल्म देखने में आता था , उतना मजा भी नहीं आ रहा हैं , कथा सुनने में ..

फ़िल्म के गीत गाने में जितना मजा आता था , उतना मजा भजन , चौपायी गाने में क्यो नहीं आ रहा हैं ??

मेरी बात सुनकर , मेरे सदगुरू की आँख से करूणा के आँसू झर – झर गिरने लगे ,

मुझे दिखाई दिया कि उनकी आँखो में जो दर्द था , जो आँसू था, वो दर्द मेरे दिल का था , मेरी तडप का था

उन प्रेम अश्रूवो से , मेरे सदगुरू ने कहा —

बेटा , मै जानता हूँ कि तुम इस समय किस तकलीफ , किस भृम की अवस्था में हो …

बेटा , हमने कभी इस भूखे मन को , इसका भोजन यानी सत्संग दिया ही नहीं …

और इस भूखे मन को अवारा पशु की तरह खुला छोड़ दिया ,, तो इस भूखे मन को जो भी कूड़ा करकट मिला , इस ने वही खाया और बीमार हो गया

tv , news paper , internet आदि का कूड़ा करकट , बुरी संगत , निन्दा करने और निन्दा सुनने का कूड़ा

बेटा , यदी तुझे बुखार हो जाय , मुह में छाले हो जाय तो क्या तुझे किसी स्वादिष्ट भोजन का स्वाद आयेगा ???

नहीं ….

वैसे तेरा मन कुसंग का कूड़ा खा खा कर बीमार हो गया है, इसलिये इस बीमार मन को स्वादिष्ट कथा का रस नही आ रहा है, इसीलिए इस समय कथा ज्यादा समझ मे भी नही आ रही है …

झार झार आँसुवो से वो बोले जा रहे थे

बेटा , चिंता मत कर , कथा ही मन की औषधि भी हैं , दवा भी हैं ,,

शुरुवात में , ये कथा को दवा के रूप में पीता जा , mobile chip , tv का सदुपयोग करके ,
दवा पीने में , ये मन बहुत नाटक़ करेगा ,
मन भागे , चीखे, चिल्लाये , कुछ भी करे , कान से mobile lead मत निकालना , कथा सुनते रहना, समझ मे आये या ज्यादा न आये, याद रहे या न रहे, कथा सुनते सुनते नींद आ जाय तो उसकी भी चिन्ता मत करो, जब जागो फिर सुनो …. कैसे भी करके कथा कान के अंदर डालते रहो

जैसे जैसे कथा उतरेगी , बीमारी ठीक होती जायेगी और इसका स्वाद तुम्हे आने लगेगा
और वही हुवा

कथा श्रवन — सुरुवाती दौर में, मन के रोग की दवा है और फिर स्वादिष्ट, पौष्टिक भोजन हैं

हमारा द्वारा (मौन + मुस्कुराहट + मन में हरी नाम जप या संकिर्तंन ) + कथा श्रवण करके, कान्हा को याद करके जो प्रेम अश्रु आते है हमारी आँखों मे और हमारे सदगुरू की आँखो के प्रेम अश्रू , करुणा के अश्रु है — इस अध्यात्म जगत का चुरन ,,

इस चूर्ण के बगैर कथा हजम नहीं होती और हम बहस में उतर कर , ज्ञानी, सत्संगी, अनुभवशील होने के झूठे अभिमान का सुख लेने लगते हैं ,

आज समाज मे देखो , हर व्यक्ती बहस करने मे लगा है , मेरा मार्ग ही सही है , सच्चा है, ध्यान करो , ये कथा व्यथा से क्या होता है ?? राम राम रटने से कुछ नही होता, ध्यान मेडिटेशन ही श्रेष्ठ है, ये पत्थर की मूर्ति की पूजा से कुछ नही होता, परमात्मा तो निराकार है, आदि आदि ढेरो तर्क वितर्क कुतर्क बहस करने में ही सारा समय , ऊर्जा व्यर्थ किये जा रहे है, मेरा गुरू ही सर्वोच्च है , मेरा तरीका , मेरा पंथ ही श्रेष्ठ है, ये सब क्या है ?? अध्यात्म मे ज़िद्द ?? ये हिंसा है , धर्म नही , अध्यात्म तो है ही नही

बर्फ कभी अपने शीतल होने का प्रचार करती है मुँह से ?? व्याख्या बहस करती है ?? नही ….

बर्फ यदि खुद को शीतल होने का प्रचार , बहस करने की भागा दौड़ी करेगी तो वो बहुत जल्दी पिघल कर खत्म हो जाएगी, शीतलता अपना स्वभाव खो देगी

बर्फ अपनी शीतलता में, अपने सरल सहज स्वभाव में मग्न रहती है, उसकी शीतलता का फैलाव ये अस्तित्व करता है, हवा करती है, वो शीतल हवा जिसको भी छुवेगी, वो तप्त परेशान गर्म व्यक्ति , अपने आप बर्फ की तरफ खिंचा हुवा आ जायेगा

धर्म छेत्र में, कथा छेत्र में आने के बाद, यदि ये चूर्ण थोड़ा भी कम पड़ गया तो हम लोग कथा को, सास्त्र को पचा नही पाएंगे और vomatting वमन , उल्टी ही करते फिरेंगे , इस धार्मिक बहस , उल्टी में बहुत बदबू है, जो हमारा तो नुकसान करती ही है, साथ ही पूरे समाज का, धर्म का भी नुकसान करती है

हमारे सनातन धर्म का, अध्यात्म (प्रेम मार्ग) का, सबसे ज्यादा नुकसान , नास्तिक लोगो ने नही किया है, बल्कि अपने आपको धार्मिक मान चुके लोगो की बहस, उल्टियों ने किया है, इसीलिए इस समाज के लोग अपनी नाक बंद करके भाग गए

वास्तव मे जो अध्यात्मिक व्यक्ति होगा , वो कभी भी, किसी भी बहस मे उतरेगा ही नही , ज़िद्द करेगा ही नही , अपना अनुभव सिर्फ पेश करेगा , कोई ना माने तो कोई ज़िद्द नही , अकेले मे रो लेगा , दुवा करेगा , उस व्यक्ती के लिये

ये अध्यात्म जगत है साहब, अच्छे सब्दो की कलाकारी, जादूगरी नही, यहाँ सिर्फ सब्दो से कुछ नही होता है,

जिस व्यक्ति का भजन पकता है, मुस्कुराहट भरा मौन पकता है, जो अकेले में बैठ कर लोगो के परम हित के लिये प्रार्थना के प्रेम अश्रु बहाता है, सभी का स्वीकार करता है, ऐसे व्यक्ति के सरीर से निकले हुए सब्द आँसू ही असर करते है किसी दूसरे इंसान पर …

चुरन लेना बहुत जरूरी है इस धर्म क्षेत्र मे ,, वर्ना एक बार उल्टी चालू हो गयी तो कान्हा का अनुभव पाना असंभव हो जायेगा

प्रेम अश्रू ( जिसकी चर्चा हमने पिचले post में की थी ) वो पानी हैं , जिस से कथा के सूत्र , रहस्य , सटा सट नीचे उतरने लगते हैं

सदगुरू स्मरण में , जो प्रेम अश्रू आते हैं , हमारी आँख में और सदगुरू की भी आँख में ,, वो हैं —

विमल ज्ञान का , विमल वैराग्य का जल ,
जिससे नहा कर हमारा मन बिलकुल fresh निरोगी मजबूत हो जाता हैं

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