Janiye kaise pandit ji ne kia bhooto ko bas me

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Janiye kaise pandit ji ne kia bhooto ko bas me


माने या ना मानें पर कहीं कुछ तो ऐसा है, जो रहस्यमय बना हुआ है। कुछ ऐसा जो कौतुहल पैदा करता है। कुछ सोचने-विचारने पर मजबूर करता है। क्या आपको नहीं लगता। कभी-कभी तो मुझे ऐसा लगता है कि इंसान की कल्पनाएँ हकीकत में बदल जाती हैं।

Janiye kaise pandit ji ne kia bhooto ko bas me

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जो कभी घटना रहती है, वही आगे चलकर कहानी में बदल जाती है। अगर इतिहास उसे अपने पन्नों में समेट लिया तो वे बातें, घटनाएँ सच्ची और अगर इतिहास के पन्नों में नहीं तो, बस काल्पनिक, कोरी कहानी की श्रेणी में आ जाती हैं, ऐसी बातें, घटनाएँ। कभी-कभी तो मुझे विज्ञान पर हँसी आती है, क्योंकि जो उसके सीमा में हैं, जो बातें, घटनाएँ, वस्तुएं, जीव आदि से वह परिचित है, उसे ही सत्य साबित करता है और बाकी चीजें उसके लिए काल्पनिक हैं, उसे विश्वास नहीं। तो क्या अगर विज्ञान जिन बातों, घटनाओं पर से पर्दा ना उठा पाए, उसे काल्पनिक मान लिया जाए? क्या विज्ञान की पहुँच की सीमा के अंदर की ही दुनिया वास्तविक है, और बाकी सब काल्पनिक? अजीब हाल है, विज्ञान, आखिर है क्या? धन्य है विज्ञान, जो बात उसकी समझ में आ जाती है, उसे वह वैज्ञानिक मान लेता है, बाकी कपोल कल्पना। सच्चाई यह है कि विज्ञान का ज्ञान सीमित है, ज्यों-ज्यों रहस्यों पर से परदा उठता जाता है, त्यों-त्यों विज्ञान उस वस्तु, घटना को लेकर अपने विचार बदलते हुए अपने ज्ञान का प्रसार करना शुरू कर देता है। यह वही विज्ञान है, जो तत्व, अतत्व के बँटवारे में उलझा हुआ है। कभी पानी को पानी बोलता है तो कभी बताता है कि यह H2O है। यह हाइड्रोजन और आक्सीजन का मिश्रण है। यह बात तो यह बताता है पर पानी नहीं बना सकता। विज्ञान भगवान को नहीं मानता पर एक छोटा सा जीव नहीं बना सकता, किसी को मौत के मुँह से नहीं बचा सकता पर कहता रहता है कि भगवान कुछ नहीं, विज्ञान ही भगवान है सब कहीं। विज्ञान को मानना गलत नहीं है पर विज्ञान जिन बातों, घटनाओं को समझ न पाए, जिन रहस्यों पर से परदा न उठा पाए, उसे कपोल-कल्पित भी कहना तो ठीक नहीं।

कहना तो नहीं चाहता था, पर अपने मित्र के साथ घटी एक छोटी घटना का जिक्र संक्षेप में कर रहा हूँ। मेरे दोस्त की पत्नी को एक चुड़ैल ने पकड़ लिया था। उसके पत्नी के हाव-भाव बदल चुके थे। वह पूरी तरह से कुछ अलग ही व्यवहार कर रही थी। मेरा दोस्त उस आत्मा से बातें करना चाहता था, बहुत कुछ जानना चाहता था, इसलिए उसने उसे एक कमरे में बैठाकर दरवाजे को अंदर से बंद करके बहुत कुछ सवाल-जवाब किए। मेरे मित्र ने उससे पूछा कि तूने इसे पकड़ा क्यों? यह तो बहुत ही पूजा-पाठ करती है। मेरे घर में भी कभी कोई बुरी आत्मा प्रवेश करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती, फिर तूँ कैसे आ गई? फिर उस चुड़ैल ने डरते हुए कहा कि ठीक है, दरअसल ये महिला निडर होकर भिनसहरे बाहर घूम रही थी और मैं भी उसी रास्ते से आ रही थी। मैंने इसे पकड़ना नहीं चाहा पर चूँकि यह अलवाती (जच्चा, हाल ही में जिसे नवजात हुआ हो) थी, इसलिए मैं अपने आप को रोक नहीं पाई। वैसे भी मैंने इसे पकड़ा नहीं है, बस मेरा छाया इसके ऊपर है। मैं डर रही हूँ, मैं इसे छोड़कर अभी चली जाती हूँ। फिर मेरे दोस्त ने कहा कि चली जाना, पर जाते-जाते तुम मेरे एक और प्रश्न का जवाब दे दो? फिर मेरे दोस्त ने पूछा कि सुना हूँ कि तुम आत्माओं के पास बहुत सारा धन होता है, हो तो दे दो ना मुझे, कुछ काम-ओम कर लूँगा और तेरा भी धन्यवाद कर दूँगा। तूँ बोलेगी तो तेरे लिए कोई यज्ञ-अनुष्ठान आदि करके तूझे मुक्त करा दूँगा। मेरे दोस्त की यह बात सुनते ही पहले तो वह चुड़ैल हँसी और फिर रोने लगी। रोते-रोते उसने कहा कि धन तो है मेरे पास, पर वह आपके किसी काम का नहीं। वैसे तो वह मेरे काम का भी नहीं है, पर पता नहीं क्यों मैं उसका मोह नहीं त्याग सकती। ऐसा क्यों है, मैं खुद ही समझ नहीं पाती। सच्चाई यह है कि हमारी भी कुछ पावंदियाँ हैं, कुछ बंदिशें हैं, मैं चाहकर भी बहुत कुछ नहीं कर पाती और न चाहकर भी बहुत कुछ कैसे कर देती हूँ, पता नहीं चलता। उस चुड़ैल की बातों से मेरे दोस्त को लगा कि यह सूक्ष्म दुनिया में रहते हुए भी स्वतंत्र नहीं है और चाहकर मुक्त भी नहीं हो सकती।

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यह घटना सुनाने के पीछे मेरी धारणा यह है कि कहीं न कहीं कुछ ऐसी बातें, चीजें, घटनाएँ आदि हैं, जो रहस्यमय हैं और जिन्हें जान पाना, समझ पाना आसान नहीं। सबसे बड़ा भगवान ही है, ईश्वर ही है और जिस प्रकार हम भी उसी परम पिता के हाथ की कठपुतलियाँ हैं, वैसे ही अन्य जीव भी, सूक्ष्म जीव भी, अनन्त आत्माएँ भीं। पर यह भी सही है कि नकारात्मकता को सदा साकारात्मकता के आगे झुकना पड़ता है, सत्य असत्य पर विजयी होता है और बुरी आत्माएँ लाख चाहें पर उन्हें अच्छी आत्माओं के आगे नतमस्तक होना ही पड़ता है। यानी अगर ईश्वरत्व की बात करें तो वह अच्छाई, सच्चाई, साकारात्मकता का प्रतिनिधित्व करता है और यही कारण है कि अच्छे, सच्चे आदि लोगों से नकारात्मक चीजें, आत्माएँ दूर रहना ही पसंद करती हैं। जी हाँ और यही कारण है कि धार्मिक चीजें भी नकारात्मकता को दूर करती हैं और बुरी आत्माओं से रक्षा। इसलिए तो मूर्ति, शंख, गाय, तुलसी आदि का महत्व है और यह महत्व कथा पर आधारित नहीं है और ना ही कपोल-कल्पना है, अपितु यह हमारे पूर्वजों की अमूल अनुभव संपन्न देन है। हमें इसका मजाक न उड़ाते हुए इसे अपने जीवन में अपनाना चाहिए, सत्य की राह पर चलना चाहिए। झूठ, छल-कपट, बेइमानी आदि से बचना चाहिए, तभी सच्चे जीवन का आनंद मिलेगा।

मैंने सुन रखी है कि कुछ लोग ऐसे दैत्य-दानवों, भूत-प्रेतों की पूजा करते हैं या अपने बस में रखते हैं, जो इनके काम आते हैं। जैसे पहले कुछ लोग दूसरे के कोठे का अनाज इन्हीं सब बुरी आत्माओं के सहारे अपने कोठे में करवा लेते थे। पर यह भी सच है कि बुरी आत्माओं को अपने अधीन में रखकर बुरे काम करवाने वाले लोग भी कभी चैन से नहीं रह पाते। उन्हें इसका खामियाजा भुगतना ही पड़ता है।

एक घटना सुनाता हूँ। हमारे जवार में एक पंडीजी थे। उनका एक बहुत बड़ा बगीचा था। वे कभी-कभी दोपहर में अपने इस बाग में गाय आदि लेकर चराने जाते थे और गाय को चरता छोड़ बाग में ही एक बड़े बरगद के नीचे अपनी अंगोछी बिछाकर सो जाते थे। फिर शाम को अपनी गाय को वापस लेकर घर आ जाते थे। पंडीजी काफी धार्मिक और सत्यवादी थे। वे कभी किसी का बुरा नहीं करते और बस काम से काम रखते। एक दिन पंडीजी अपनी अंगोछी बिछाकर गहरी नींद में उसी बरगद के नीचे सोए हुए थे। अचानक उनकी नींद खुल गई पर वे सोने का नाटक करते रहे। दरअसल उन्हें आभास हुआ कि वे जहाँ सोए हैं, वहां नीचे जमीन में कुछ तो खनखना रहा है। फिर वे सोने का नाटक करते हुए और सतर्क होकर आस-पास की चीजों आदि को सुनने की कोशिश करते हुए कनखी नजरों से इधर-उधर देखने की भी कोशिश करने लगे। अचानक उस बरगद के पेड़ पर उन्हें दो प्रेत बैठे हुए दिखाई दिए। वे दोनों प्रेत आपस में बात कर रहे थे और बात ही बात में वे दोनों आपस में लड़ बैठे। पंडीजी को कुछ बातें क्लियर हो रही थीं। दरअसल उनका झगड़ा वहाँ गड़े खजाने को लेकर था। एक प्रेत कहता था कि वह मेरा है और दूसरा कहता था कि मेरा। और वे दोनों प्रेत बरगद पर बैठे-बैठे ही अपनी शक्तियों के बल पर गड़े हुए धन को अपने अधीन करने की कोशिश कर रहे थे, जिसके चलते पंडीजी के सोए हुए जमीन के नीचे से खनखनाहट की आवाज आ रही थी। एक प्रेत तो बोल पड़ा कि जब से ये पंडीजी इस जगह पर सोना शुरू किए हैं, खजाना भी डरने लगा है और मैं भी। दरअसल अगर खजाना काफी दिन तक जमीन में गड़ा रह जाए तो उसपर आत्माओं का वास हो जाता है या उस खजाने में भी इतनी शक्ति आ जाती है कि वह इधर-उधर आ-जा सकता है या अपने हिसाब से जिसे चाहे मालामाल कर सकता है।

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पंडीजी, सोए ही सोए कुछ दुर्गा मंत्र बुदबुदाए। उस मंत्र के प्रभाव से वे दोनों प्रेत पंडीजी के पास खींचे चले आए। पंडीजी ने उन दोनों से कहा कि डरो मत। मैं तुम्हें तुम्हारे इस योनि से छुटकारा दिलवा सकता हूँ, अगर तुम लोग तैयार हो तो? उनमें से एक प्रेत बहुत ही ढीठ था, वह पहले पंडीजी को डराना चाहा पर पंडीजी हँसते हुए अपने मंत्रों के उच्चारण से उसे कितनी ही बार उठा-उठाकर पटक दिए और उसे जलाने की धमकी देने लगे। अंततः मरता क्या न करता, वह प्रेत पूरी तरह से शांत हो गया और पंडीजी के हाँ में हाँ मिलाने लगा। फिर पंडीजी ने कहा कि तुम लोग अपनी जीवनी बताओ, अपना नाम आदि। मैं गया में जाकर तुम लोगों के लिए पिंडदान करूँगा। प्रेत तैयार हो गए और साथ ही वहाँ गड़े धन को पंडीजी को सौंपना चाहे। पर अरे यह क्या वे लोग ज्योंही धन निकालने की कोशिश किए उन्हें तो मुँह की खानी पड़ी। उस खजाने की खनखनाहट बड़ गई और वो अपनी शक्ति से इन दोनों प्रेतों पर भारी पड़ गया। देखते ही देखते वहाँ जमीन से दो चाँदी के बटुले निकल आए, जिसमें खजाना था। वे दोनों बटुले हवा में उड़ते हुए उन प्रेतों पर वार करने लगे। पंडीजी आराम से बैठकर बटुलों और उन प्रेतों के युद्ध को देखते रहे। अंत में बटुले उन प्रेतों के हाथ नहीं ही लगे और वे प्रेत थक-हार कर हाँफते हुए पंडीजी के पास आकर बैठ गए। फिर अचानक वे बटुले भी शांत होते हुए वहीं धरती में समा गए। वे प्रेत कातर नजरों से पंडीजी की ओर दिख रहे थे और अपनी असहाय स्थिति के लिए शर्मिंदा महसूस कर रहे थे। फिर अचानक पंडीजी बोल पड़े, कोई बात नहीं तुम लोग इस खजाने को काबू में नहीं कर पाए और बेकार में इसके लिए लड़ रहे थे। चलो, मैं इसे काबू में करके ही दम लूँगा। इसके बाद पंडीजी उठे, वहीं पास में एक पलास के पेड़ से एक पतली टहनी तोड़ें। फिर कुछ मंत्र बुदबुदाते हुए उस टहनी से उस जगह पर एक गोल घेरा बना दिए, जहाँ बटुले गड़ गए थे। दरअसल पंडीजी ने मंत्र से उस स्थान को बाँध दिया था, यानी वह खजाना अब वहाँ से इधर-उधर नहीं जा सकता था।

अब तो हर दिन पंडीजी सुबह-सुबह ही नहा धोकर उस बगीचे में आते और उस खजाने के ऊपर कुछ पूजा-पाठ आदि करते। दरअसल पंडीजी पूजा-पाठ करके पहले उस धन को शांत करना चाहते थे ताकि उसे आसानी से प्राप्त किया जा सके। लगभग 51 दिन तक लगातार पूजा करने के बाद पंडीजी को लगा कि अब इस खजाने को निकाला जा सकता है। एक दिन भिनसहरे वे कुदाल लिए और बगीचे में पहुँचकर उस खजाने को निकाल लिए।

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लोग तो कहते हैं कि उस खजाने से पंडी जी ने कई कुएँ आदि खुदवाए, गाँव में एक स्कूल भी बनवाए और साथ ही गरीब-गुरबों की मदद किए। इतना ही नहीं पंडीजी गया भी गए और गया जाकर पिंडदान करके उन दोनों प्रेतों को मुक्त कराए। पंडीजी जब तक रहे उस धन का सही उपयोग करते रहे। पर उनके मरने के बाद उनके बेटे से उस धन से अपने लिए बहुत कुछ करना चाहा पर वह संभव नहीं हो पाया। वह पूरी तरह से बरबाद हो गया और उसकी बरबादी के पीछे यह धन ही था। आज पंडीजी के कुछ वंशज ठीक-ठाक हैं पर उस बगीचे में उस बरगद के आस-पास की जगह पर एक मंदिर बनवा दिए हैं। आज न वह बगीचा है और न ही वह बरगद का पेड़ पर पुरनिया लोगों की यादों में वे पंडीजी और यह खजाना आज भी अपने अस्तित्व को बनाए हुए हैं। जय-जय।

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