Janiye aakhir hume gussa kyu aata hai aur kisliye aata hai

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Janiye aakhir hume gussa kyu aata hai aur kisliye aata hai


कहानी और हकीकत में अंतर क्या है ??
(क्रोध का विज्ञान)

कहानी — मौन की शक्ति
*एक चुप सौ सुख*

Janiye aakhir hume gussa kyu aata hai aur kyu aata hai

Janiye aakhir hume gussa kyu aata hai aur kyu aata hai

एक मछलीमार काँटा डालकर तालाब के किनारे बैठा था ! काफी समय बाद भी कोई मछली काँटे में नहीं फँसी, ना ही कोई हलचल हुई , तो वह सोचने लगा… कहीं ऐसा तो नहीं कि मैंने काँटा गलत जगह डाला है, यहाँ कोई मछली ही न हो ! उसने तालाब में झाँका तो देखा कि उसके काँटे के आसपास तो बहुत-सी मछलियाँ थीं ! उसे बहुत आश्चर्य हुआ कि इतनी मछलियाँ होने के बाद भी कोई मछली फँसी क्यों नहीं ?

एक राहगीर ने जब यह नजारा देखा , तो उससे कहा ~ लगता है भैया ! यहाँ पर मछली मारने बहुत दिनों बाद आए हो ! अब इस तालाब की मछलियाँ काँटे में नहीं फँसतीं मछलीमार ने हैरत से पूछा ~

क्यों … ऐसा क्या है यहाँ ?

राहगीर बोला ~ पिछले दिनों तालाब के किनारे एक बहुत बड़े संत ठहरे थे ! उन्होने यहाँ मौन की महत्ता पर प्रवचन दिया था ! उनकी वाणी में इतना तेज था कि जब वे प्रवचन देते तो सारी मछलियाँ भी बड़े ध्यान से सुनती !

यह उनके प्रवचनों का ही असर है , कि उसके बाद जब भी कोई इन्हें फँसाने के लिए काँटा डालकर बैठता है , तो ये मौन धारण कर लेती हैं !

जब मछली मुँह खोलेगी ही नहीं , तो काँटे में फँसेगी कैसे ? इसलिए … बेहतर यहीं होगा कि, आप कहीं और जाकर काँटा डालो ।

परमात्मा ने हर इंसान को दो आँख, दो कान, दो नासिका, हर इन्द्रिय दो-दो ही प्रदान करी हैं , लेकिन जिह्वा एक ही दी है !

क्या कारण रहा होगा ?

क्योंकि … यह एक ही अनेकों भयंकर परिस्थितियाँ पैदा करने के लिये पर्याप्त है !

संत ने कितनी सही बात कही है , कि,

*जब मुँह खोलोगे ही नहीं , तो …फँसोगे कैसे ?*

*ऐसे ही, जो,*
*अगर इन्द्रिय पर संयम करना चाहते हैं , तो,इस जिह्वा पर नियंत्रण कर लो …, तो, बाकी सब इन्द्रियाँ स्वयं नियंत्रित रहेंगी !*

*यह बात हमें भी अपने जीवन में उतार लेनी चाहिए !*

*एक चुप ~ सौ सुख* ~

【 नमो नारायण 】

फेसबुक पर ये कहानी पढ़ कर मुझे हँसी आ गयी, क्योकि ऐसी कहानियों से मैं बिल्कुल भी सहमत नही हूँ

इस समाज मे अधिकतर लोगों का हाल यही है कि

“”” हमने दिल को यू ही बहलाया है,

जो खुद नही समझे औरों को समझाया है “”

जो भी आता है, हमे यही सिखाता है कि साहनी.. तुम गुस्सा बहुत करते हो, कडुवा बहुत बोलते हो, चुप रहना सीख लो… या फिर कहेगा कि गुस्से को कंट्रोल करो , मन को कंट्रोल करो …
???

जब कि जो व्यक्ति ये बोल रहा है , उसी का गुस्सा उसके कंट्रोल में नही है ???

क्या आज तक हमे कोई ऐसा इंसान मिला है ?? जिसने इस गुस्से के विज्ञान को हमे समझाया हो ?? उस पूरे method को अनुभव कराने की कोसिस करी हो ?? कि गुस्से को डिसॉल्व करने का तरीका क्या है ??

खाना, पीना, कपड़े बदलना आदि क्रियाये हम करते है, इसलिये इन क्रियाओं को हम कुछ समय के लिये कंट्रोल कर सकते है

परन्तु गुस्सा ??

ये तो बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक ज्वालामुखी की तरह फटता है, जो हमारे कंट्रोल में नही होता है,

गुस्सा जब उतरता है , तो पीछे छोड़ जाता है — पश्चाताप का दर्द, दुख, और रिस्तो में कड़वाहट

आप खुद अपने आप से पूछिए , कौन इंसान अनावश्यक गुस्सा करना चाहता है ?? ??? कोई नही …

25-26 साल की एक लड़की एक दिन , मुझसे बात करते हुए , गुस्से में बोली फिर रोने भी लगी कि

हर इंसान, मम्मी पापा भी , मुझे ही दोष देते रहते है कि सब तुम्हारी ही गलती है, क्यो इतना बोलती हो ?? चुप रहा करो … ससुराल जावोगी तो कैसे रहोगी ?? कैसे रिस्ते निभावगी ?? एक कान से सुनो दूसरे से निकाल दो ?? और भी बहुत कुछ बोलती चली वो…

उसकी बातें सुनकर, उसकी स्थिति, उसका दर्द मुझे महसूस हो रहा था , इसलिये मैं भी रोने लगा ??

और रोते हुए ही उस बहन से बोला कि

नही, बेटा, समाज के लोगो की तरह, मनोज साहनी तुमसे सिर्फ चुप रहने के लिये नही कहेगा ?? क्योकि सिर्फ मुँह बन्द कर लेने से ये समस्या ठीक नही होगी.. ? सिर्फ मुँह बन्द कर लिया और ये गुस्सा, ये आग, ये जलन हमारे भीतर दबा रह गया तो … ??

ये गुस्सा , ये आग , desolve नही हुवा, ठंडा नही हुवा तो तुम उस भयंकर जलन , दर्द को बर्दाश्त नही कर पावोगी और जिस दिन ये high pressure ज्वालामुखी फटेगा तो तुम आत्महत्या कर बैठोगी एक दिन ???

उदाहरण — मान लो कि कोई ज्वालामुखी के मुँह से बहुत गर्म लावा, धूल, गैस, निकल रही हो … और वो ज्वालामुखी करीब 5 किलोमीटर के एरिया को प्रभावित कर रहा हो.. और हम उसके मुँह पर बहुत बड़े बड़े पत्थर डाल दे, और उसका मुँह बन्द कर दे तो क्या होगा ?? तो कुछ समय के लिये लगेगा कि ज्वालामुखी शान्त हो गया…

परन्तु क्या वास्तव में ज्वालामुखी शान्त हो गया ??

क्या वास्तव में , सिर्फ मुँह बन्द करने से समस्या ठीक हो गयी ??

नही …

क्योकि हमने ज्वालामुखी का सिर्फ मुँह बन्द किया है, उसके अंदर जो लावा , उफ़न रहा है, उसे ठंडा नही किया…

ज्वालामुखी का मुँह हमने बन्द कर दिया तो सिर्फ इतना ही फर्क पड़ेगा कि कुछ समय के लिये, उसके मुँह से लावा निकलना बंद हो गया … परन्तु अंदर जो लावा उफ़न रहा है , धीरे धीरे उसके अंदर का प्रेशर बढ़ता जाएगा और कुछ समय के बाद , जब वो धरती का सीना फाड़ कर निकलेगा तो सायद 50 या 100 किलोमीटर के एरिया को पूरा तबाह कर देगा… मुँह से निकल रहा था तो सिर्फ 5 किलोमीटर के एरिया को प्रभावित कर रहा था… सिर्फ मुँह बन्द कर दिया और बाद में हाई प्रेशर पर फटा तो 50 किलोमीटर के एरिया को तबाह कर दिया… यानी सिर्फ मुँह बन्द कर देना, बहुत बड़ी तबाही को आमंत्रित करना है..

ठीक वैसे ही, इंसान के साथ भी है, यदि हमने सिर्फ मुँह बन्द कर लिया, और दिल मे मौजूद जलन, गुस्सा, नफरत , शान्त नही हुई तो एक समय आता है कि इंसान या तो आत्महत्या कर लेता है… या फिर कुछ लोग आत्मघाती आतंकवादी बन जाते है

इसीलिए जब हम अध्यात्म में आते है तो करुणा से भरा हुवा साधु , सजल नेत्र हमसे प्रार्थना करता है कि

बेटा, जब गुस्सा उतरता है तो तुम्हे पश्चाताप का दर्द होता है ?? तो उस पश्चाताप के दर्द को समेटो , सम्भालो ,

क्योकि ये पश्चाताप का दर्द ही तुम्हे उस मार्ग पर , उस विज्ञान method पर टिका पायेगा, चला पायेगा, जिस method से अंदर का लावा ठंडा होता है धीरे धीरे,

हमारे सीने में, दिल मे, मन मे, बुद्धि में , जो भर्मो से उत्तपन्न नफरत ला लावा जमा हो गया है, वही मुँह से, वाणी से, कटु सब्दो के रूप में, बहस के रूप में बाहर निकलता है..??

सिर्फ 2 साल पहने कान दे दो बेटा, मुँह पर टेप यानी मौन होने का प्रयास और नाम भजन की गुनगुनाहट… और कान से कथा श्रवण की लीड मत निकलना… ये भजन गुनगुनाहट, कथा श्रवण ही वो जल है जिससे सीने की जलन धीरे धीरे शान्त होगी…

गुस्से का पूरा विज्ञान है, उसे हमे समझना होगा और उस प्रोसेस पर चलना होगा ???

अध्यात्म जीवन जीने की कला सिखाता है,

अध्यात्म प्रेम विज्ञान है

अनावश्यक गुस्सा क्यो आ रहा है हमे ???

क्योकि बुद्धि का सारा data ही खराब हो गया है, ढेरो भृम घुस गए है, इन्ही ढेरो भर्मो के कारण, हमें बार बार ये भृम होता है कि मैं सही हूँ, मैं क्यो चुप रहू ?? ये सामने वाला ही गलत है, ( जब कि सत्य ये है कि 90-95% केस में , सामने वाला भी अपनी जगह पर सही ही होता है, परन्तु भृम के कारण हम देख नही पाते है)

और हम अपनी बात को सही मनवाने की जिद्द में लड़ जाते है, गुस्से बहस में उतर जाते है, अध्यात्म धीरे धीरे इन भर्मो को हल्का करता है, मिटाता है

दूसरा हमारा मन… इतना चिड़चिड़ा बीमार हो गया कि जरा सी बात पर ही चिनक जाता है, क्योकि हमने कभी अपने मन पर ध्यान ही नही दिया , इसे दवा दे कर, फिर भोजन दे कर ठीक करना पड़ेगा, यानी मन को भावनात्मक अपनत्व का, भजन का सुख , सुकून देना होगा

अध्यात्म के सुभ तर्को से, उदाहण से, यदि बुद्धि के भर्मो का, कुतर्को का, प्रश्नो का निवारण नही हुवा

और मन को भजन का, कान्हा का, सुकून का अनुभव नही हुवा

तो कोई माई का लाल पैदा नही हुवा है जो गुस्से को कंट्रोल कर सके

हा , ये हो सकता है कि किसी स्वार्थ , लोभ के कारण वो गुस्सा , वाणी की हिंसा में न बदले , लेकिन गुस्सा तो आया ही, और वो कही न कही निकलेगा ही

जैसे — किसी कुशल व्यपारी को देखिये …

लोभ के कारण सिर्फ वाणी की हिंसा कुछ देर के लिये रुक जाती है, वो भी सिर्फ ग्राहकों के सामने या जिससे स्वार्थ सिद्ध होना है

परन्तु उसका गुस्सा खत्म नही हुवा है, वही गुस्सा फिर निकलता है — पत्नी पर, बच्चों पर, नौकरों पर, कमजोर पर

सिर्फ एक साल कथा श्रवण करके देखिये, फर्क दिखने लगेगा

कथा रूप कान्हा
सद्गुरु रूप कान्हा , कुछ भी कर सकते है ,

ये दोनों मन , बुद्धि , चित्त के सुपर स्पेशलिस्ट है

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