Hey Rukmani tumne mujhse vivah kyu kya hain hindi kahani

Hey Rukmani tumne mujhse vivah kyu kya hain hindi kahani

एक बार रुक्मिणी जी अपने परिवार, जिसमें कि पोते-पोतियां भी थे, के साथ सजी-धजी बैठी थीं। भगवान ने विनोद किया कि हे रुक्मिणी! तुमने मुझसे विवाह क्यों किया? तुमको पता नहीं है क्या? मेरे माता-पिता, कुल, गोत्र, धर्म का कुछ भी पता नहीं, मैं सुन्दर भी नहीं हूं, डरपोक हूं ः- देखो रण छोड़ कर भाग आया और तुम्हें चाहता भी नहीं हूं अर्थात् उदासीन हूं। देखो! तुम शिशुपाल के पास चली जाओ। वो तुम्हें चाहता भी है। इसको सुनते ही रुक्मिणी जी मूर्छित हो गयीं। भगवान ने चतुर्भुज रुप धारण करके रुक्मिणी जी के कपोल पर आये हुए बाल हटाए और अपने पीताम्बर से रुक्मिणी जी की हवा करने लगे। रुक्मिणी जी की मूर्छा दूर हो गई। भगवान ने कहा कि मैं तो विनोद (मजाक) कर रहा था। ऐसा कहते हैं कि रुठा-रुठी के बिना विनोद नहीं होता। मैं तो आपके चेहरे पर क्रोध के भाव देखना चाहता था, परंतु आपको तो मूर्छा ही आ गयी। रुठा-रुठी से प्रेम बढ़ता है।

Hey Rukmani tumne mujhse vivah kyu kya hain hindi kahani

Hey Rukmani tumne mujhse vivah kyu kya hain hindi kahani

रुक्मिणी जी ने कहा कि हे प्रभो! आपने सब बातें सही कही हैं। आपने कहा कि आप सुन्दर नहीं है। वास्तव में आप सुन्दर नहीं, सुन्दरतर नहीं, सुन्दरतम् हैं। प्रभो! आपने कहा कि मेरे माता-पिता के बारे में पता नहीं। कुल, गोत्र को कोई नहीं जानता। तो प्रभो! ब्रह्म के भी माता-पिता होते हैं क्या? सम्पूर्ण जगत् के माता-पिता तो आप हैं ः- त्वमेव माता च पिता त्वमेव। प्रभो! ब्रह्म का कौन सा कुल और कौन सा गोत्र?

आपने कहा कि मेरा कोई सम्प्रदाय नहीं। तो हे प्राणनाथ! सम्प्रदाय तो एक सीमा में रहता है। धर्म और सम्प्रदाय की सीमा में आप कैसे सीमित हो सकते हैं? आप असीम हैं और धर्म, सम्प्रदाय ससीम हैं।

आपने कहा कि मैं डरपोक हूं तो हे हृषिकेश! राजा ही तो इन्द्रियां हैं। इन्हीं राजा रुप इन्द्रियजन्य विषयों से आप अंतर्मुख होकर अंतःसमुद्र में आये हैं अर्थात् आप इन्द्रियातीत हो गये हैं।

हे भगवान! आपने कहा कि मैं तुम्हें चाहता नहीं हूं। यह बिल्कुल ठीक है। हे प्रभो! मुझे महालक्ष्मी कहते हैं, जो मुझे ठुकराता है, मैं उसके पीछे-पीछे भागती हूं। आपने मुझे ठुकराया तो मैं आपके पास आ गई। जो मेरे पीछे ही पड़ा रहता है, मैं उससे दूर होती हूं।

भगवान ने रुक्मिणी जी से जो कुछ भी कहा, रुक्मिणी जी ने सभी बातों पर सकारात्मक विचार रखा। प्रभु ने रुक्मिणी जी की प्रशंसा की और कहा कि आप जैसी अनुकूला धर्मपत्नी यदि मिले तो गृहस्थ धन्य हो जाये।

शिक्षा- कभी-कभी गृहस्थ में हास्य-विनोद भी होना चाहिए परन्तु प्रभु का परिवार तो विशाल है लेकिन प्रभु किसी में मोह नहीं है।

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