100 kauravo ki ek behan ki prachin kahani

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100 kauravo ki ek behan ki prachin kahani


कौरव यानी दुर्योधन ओर उसके 100 भाई, लेकिन कौरवों की 1 बहन भी थी, नाम था दुशाला। दुशाला का विवाह सिंध देश के राजा जयद्रथ के साथ हुआ था। जयद्रथ के पिता वृध्दक्षत्र थे। जयद्रथ को यह वरदान प्राप्त था कि, यदि कोई उसका वध करके उसका सिर जमीन पर गिरायेगा। तो मारने वाले के सिर के 100 टुकड़े हो जाएंगे।

महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन ने जयद्रथ का वध कर दिया, तब दुशाला ने स्वयं के संरक्षण में अपने बालक ‘सुरथ’ को सिंधु देश के सिंहासन पर बैठाया। जब पांडवों ने अश्वमेघ यज्ञ करवाया तो उनका घोड़ा सिंधु देश जा पहुंचा। घोड़े की सुरक्षा की जिम्मेदारी अर्जुन पर थी।

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लेकिन अर्जुन के आने का समाचार सुनते ही सुरथ की मृत्यु हो गई। तब सुरथ के पुत्र और दुशाला को पौत्र ने अर्जुन से युद्ध किया। अर्जुन, दुशाला को अपनी बहन मानते थे। इसलिए वह अपनी बहन के पौत्र को जीवनदान देते हुए आगे की ओर चले गए थे।

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महाभारत में उल्लेख है कि दुर्योधन की माता गांधारी को महर्षि वेदव्यास ने 100 पुत्र होने का वरदान दिया था। गांधारी जब गर्भवती हुईं, तो दो साल तक उनका गर्भ ठहरा रहा। लेकिन जव गर्भ बाहर आया तो वह एक लोहे का गोला था।

गांधारी ने लोकलाज के चलते इस गोले को फेंकने का निर्णय लिया। जब वह इसे फेंकने जा रही थी तभी वेदव्यास आ गए और उन्होंने उस लोहे के गोले के सौ छोटे-छोटे टुकड़े किए और इन्हें से सौ अलग-अलग मटकियों में कुछ रसायनों के साथ रख दिया। एक टुकड़ा और बच गया था, जिससे दुर्योधन की बहन दुशाला का जन्म हुआ।


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